बिहार बोर्ड — कक्षा 12 : राजनीति विज्ञान
अध्याय 2 : एक दल के प्रभुत्व का दौर
📑 विषय-सूची (Contents)
- परिचय एवं पृष्ठभूमि
- स्वतंत्र भारत की पहली आम चुनाव (1952)
- एक दल के प्रभुत्व का अर्थ एवं विशेषताएँ
- कांग्रेस के प्रभुत्व के कारण
- कांग्रेस की संगठनात्मक संरचना एवं कार्यप्रणाली
- विपक्षी दलों की स्थिति
- कांग्रेस के भीतर गुटवाद (Factionalism)
- नेहरू युग (1947–1964)
- 1967 के चुनाव एवं गठबंधन की राजनीति
- कांग्रेस का विभाजन (1969)
- 1971 के लोकसभा चुनाव
- 1975 का आपातकाल
- 1977 का चुनाव एवं जनता पार्टी
- 1980 एवं 1984 के चुनाव
- कांग्रेस प्रणाली का पतन
- महत्वपूर्ण तिथियाँ एवं तथ्य
- महत्वपूर्ण प्रश्न (परीक्षा के लिए)
1. परिचय एवं पृष्ठभूमि
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता के साथ ही भारत के सामने अनेक चुनौतियाँ थीं — देश का विभाजन, रियासतों का विलय, शरणार्थियों की समस्या, आर्थिक पिछड़ापन एवं सामाजिक विषमताएँ। इन सबके बीच भारत ने लोकतंत्र का मार्ग अपनाया और 1952 में पहला आम चुनाव कराया।
इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी विजय प्राप्त की और अगले लगभग दो दशकों तक (1967 तक) केंद्र तथा अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का ही शासन रहा। भारतीय राजनीति के इस दौर को “एक दल के प्रभुत्व का दौर” (Era of One-Party Dominance) या “कांग्रेस प्रणाली” (Congress System) कहा जाता है।
2. स्वतंत्र भारत की पहली आम चुनाव (1952)
पृष्ठभूमि
- भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद संविधान निर्माण की प्रक्रिया पूरी हुई।
- 26 नवंबर 1949 को संविधान अंगीकृत हुआ एवं 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।
- संविधान लागू होने के बाद भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया।
- अब देश में सार्वभौम वयस्क मताधिकार के आधार पर आम चुनाव कराने की आवश्यकता थी।
- इसके लिए भारतीय निर्वाचन आयोग का गठन किया गया, जिसके प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन थे।
प्रथम आम चुनाव (1951–52)
- अवधि — अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952 तक।
- लोकसभा की सीटें — कुल 489 सीटें।
- मतदाताओं की संख्या — लगभग 17.3 करोड़ (जिनमें लगभग 85% निरक्षर थे)।
- यह विश्व के इतिहास का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग था।
- चुनाव प्रक्रिया को सरल एवं सुगम्य बनाने के लिए रंगीन मतपेटियों एवं चुनाव चिह्नों का प्रयोग किया गया।
चुनाव परिणाम
| दल | लोकसभा सीटें | प्रतिशत मत |
|---|---|---|
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 364 | 44.99% |
| सोशलिस्ट पार्टी | 12 | 10.5% |
| कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया | 16 | 3.29% |
| भारतीय जनसंघ | 3 | 3.06% |
| अन्य एवं निर्दलीय | 94 | — |
प्रथम चुनाव की विशेषताएँ
- यह विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक चुनाव था।
- लगभग 50% मतदान हुआ, जो नए लोकतंत्र के लिए उत्साहजनक था।
- कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ।
- स्वतंत्र उम्मीदवारों एवं छोटे दलों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया।
- यह चुनाव भारतीय लोकतंत्र की सफलता का प्रमाण बना।
3. एक दल के प्रभुत्व का अर्थ एवं विशेषताएँ
एक दल की व्यवस्था में केवल एक ही दल कानूनी रूप से मान्य होता है (जैसे चीन, पूर्व सोवियत संघ)।
एक दल के प्रभुत्व में अनेक दल होते हैं, परंतु एक दल चुनावों में बार-बार जीतता है (जैसे भारत में कांग्रेस)। यह बहुदलीय लोकतंत्र ही होता है।
विशेषताएँ
- एक प्रमुख दल का लंबे समय तक शासन।
- अनेक विपक्षी दलों का होना, परंतु वे सत्ता में न आ पाना।
- स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की व्यवस्था।
- प्रमुख दल के भीतर विभिन्न विचारधाराओं का समावेश।
- जनता का विश्वास प्रमुख दल पर बना रहना।
- विपक्षी दलों की भूमिका सीमित, परंतु महत्वपूर्ण।
भारत में एक दल के प्रभुत्व का स्वरूप
- भारत में 1952 से 1967 तक कांग्रेस का प्रभुत्व रहा।
- इस अवधि में केंद्र तथा अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकार रही।
- कांग्रेस एक “छतरी दल” (Umbrella Party) की तरह कार्य करती थी, जिसके नीचे विभिन्न विचारधाराएँ एवं वर्ग समाहित थे।
- राजनीतिक वैज्ञानिक रजनी कोठारी ने इसे “कांग्रेस प्रणाली” (Congress System) कहा।
4. कांग्रेस के प्रभुत्व के कारण
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस की केंद्रीय भूमिका रही थी, जिसका प्रभाव स्वतंत्रता के बाद भी बना रहा। कांग्रेस के प्रभुत्व के अनेक कारण थे —
(क) ऐतिहासिक एवं राजनीतिक कारण
- स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व — कांग्रेस ने 1885 से 1947 तक स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया। जनता के मन में इसकी छवि “देश को आजाद कराने वाली” पार्टी की थी।
- स्वतंत्रता आंदोलन में बलिदान — कांग्रेस के अनेक नेताओं ने जेल यातनाएँ सहीं, जिससे जनता का सहानुभूति एवं विश्वास प्राप्त हुआ।
- राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान संगठन का विस्तार — कांग्रेस का संगठन देश के कोने-कोने तक फैला हुआ था।
- संविधान निर्माण में भूमिका — संविधान सभा में कांग्रेस के नेताओं का वर्चस्व रहा।
(ख) संगठनात्मक कारण
- व्यापक जनाधार — कांग्रेस में सभी वर्गों, जातियों, धर्मों एवं क्षेत्रों के लोग सम्मिलित थे।
- संगठनात्मक ढाँचा — कांग्रेस का संगठन गाँव से लेकर केंद्र तक फैला हुआ था।
- लोकप्रिय नेतृत्व — नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, राजेंद्र प्रसाद जैसे करिश्माई नेता।
- चुनावी रणनीति — कांग्रेस ने उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक संतुलन का ध्यान रखा।
- वित्तीय साधन — उद्योगपतियों एवं व्यापारियों का समर्थन।
(ग) वैचारिक कारण
- मध्यमार्गी विचारधारा — कांग्रेस ने न अति वामपंथी और न अति दक्षिणपंथी रुख अपनाया।
- समावेशी नीति — कांग्रेस ने सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की नीति अपनाई।
- राष्ट्रवाद एवं विकास का एजेंडा — कांग्रेस ने राष्ट्रीय एकता एवं आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी।
- धर्मनिरपेक्षता — कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को अपना आधार बनाया।
(घ) अन्य कारण
- विपक्ष का कमजोर होना — विपक्षी दल बिखरे हुए एवं संगठनात्मक रूप से कमजोर थे।
- नेहरू की लोकप्रियता — जवाहरलाल नेहरू की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति एवं जनप्रियता।
- चुनाव चिह्न एवं प्रतीक — कांग्रेस का चुनाव चिह्न “दो बैलों की जोड़ी” जनता के बीच लोकप्रिय था।
- जनता का अनुभवहीनता — नई स्वतंत्र जनता के पास अन्य दलों का कोई अनुभव नहीं था।
5. कांग्रेस की संगठनात्मक संरचना एवं कार्यप्रणाली
संगठनात्मक ढाँचा
- केंद्रीय स्तर — अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC), कांग्रेस कार्य समिति (CWC), कांग्रेस अध्यक्ष।
- राज्य स्तर — प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC)।
- जिला स्तर — जिला कांग्रेस कमेटी (DCC)।
- स्थानीय स्तर — ब्लॉक एवं ग्राम स्तर की कमेटियाँ।
कार्यप्रणाली की विशेषताएँ
- आंतरिक लोकतंत्र — कांग्रेस में भीतर ही बहस एवं विचार-विमर्श की परंपरा थी।
- गुटवाद — कांग्रेस के भीतर विभिन्न गुटों का अस्तित्व था, परंतु वे पार्टी को तोड़ते नहीं थे।
- सर्वसम्मति की राजनीति — निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते थे।
- जनभागीदारी — पार्टी में जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जाती थी।
- चुनावी रणनीति — उम्मीदवारों के चयन में जाति, धर्म, क्षेत्र एवं वर्ग का ध्यान रखा जाता था।
6. विपक्षी दलों की स्थिति
1952 से 1967 तक भारत में अनेक विपक्षी दल थे, परंतु उनमें से कोई भी कांग्रेस को चुनौती देने में सक्षम नहीं था। इन दलों की स्थिति निम्नलिखित थी —
प्रमुख विपक्षी दल
| दल | स्थापना | विचारधारा |
|---|---|---|
| भारतीय जनसंघ | 1951 | दक्षिणपंथी, हिंदुत्व एवं राष्ट्रवाद |
| सोशलिस्ट पार्टी | 1948 | समाजवादी, समाजवाद एवं विकेंद्रीकरण |
| कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) | 1925 | वामपंथी, मार्क्सवादी-लेनिनवादी |
| कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) — CPI(M) | 1964 | वामपंथी, मार्क्सवादी |
| प्रजा सोशलिस्ट पार्टी | 1952 | समाजवादी |
| अखिल भारतीय राम राज्य परिषद् | 1952 | हिंदू राष्ट्रवादी |
विपक्ष की कमजोरियाँ
- बिखराव — विपक्षी दल आपस में ही लड़ते रहते थे।
- संगठनात्मक कमजोरी — इनका संगठन देशव्यापी नहीं था।
- नेतृत्व की कमी — विपक्ष में नेहरू जैसा करिश्माई नेता नहीं था।
- सीमित जनाधार — विपक्ष का प्रभाव कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित था।
- वैचारिक अस्पष्टता — इनकी विचारधारा स्पष्ट नहीं थी।
विपक्ष की भूमिका
- सरकार की नीतियों की आलोचना करना।
- जनता के मुद्दों को सदन में उठाना।
- सरकार को जवाबदेह बनाना।
- लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाना।
- सरकार के अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाना।
7. कांग्रेस के भीतर गुटवाद (Factionalism)
कांग्रेस में प्रमुख गुट
- नेहरू गुट — प्रगतिशील, समाजवादी एवं धर्मनिरपेक्ष विचारधारा।
- पटेल गुट — व्यावहारिक, संगठनात्मक एवं रूढ़िवादी विचारधारा।
- प्रजा सोशलिस्ट गुट — समाजवादी विचारधारा।
- दक्षिणपंथी गुट — पुराने कांग्रेसी एवं रूढ़िवादी तत्व।
- वामपंथी गुट — कांग्रेस के भीतर वामपंथी विचारधारा के समर्थक।
गुटवाद के प्रभाव
- पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बल मिला।
- विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व हुआ।
- पार्टी के भीतर नेतृत्व परिवर्तन सुगम हुआ।
- परंतु कभी-कभी गुटवाद से पार्टी कमजोर भी हुई।
- गुटवाद के कारण ही 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ।
8. नेहरू युग (1947–1964)
जवाहरलाल नेहरू का व्यक्तित्व
- भारत के प्रथम प्रधानमंत्री (1947–1964)।
- करिश्माई नेता, विचारक एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनेता।
- लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता एवं समाजवाद के पक्षधर।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रमुख स्तंभ।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं आधुनिकीकरण के समर्थक।
नेहरू की प्रमुख नीतियाँ
- लोकतंत्र एवं संसदीय व्यवस्था — नेहरू ने संसदीय लोकतंत्र को मजबूत किया।
- धर्मनिरपेक्षता — सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार।
- समाजवाद एवं नियोजन — मिश्रित अर्थव्यवस्था एवं पंचवर्षीय योजनाएँ।
- गुटनिरपेक्षता — अमेरिका एवं सोवियत संघ के बीच तटस्थता।
- विज्ञान एवं तकनीक — IIT, AIIMS, परमाणु कार्यक्रम।
- पंचशील सिद्धांत — चीन के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व।
नेहरू युग की उपलब्धियाँ
- भारत में लोकतांत्रिक परंपरा की स्थापना।
- धर्मनिरपेक्ष एवं समावेशी राजनीति की नींव।
- भारी उद्योगों एवं विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति।
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा में वृद्धि।
- राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की रक्षा।
नेहरू युग की आलोचनाएँ
- चीन से युद्ध (1962) में पराजय।
- कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में असफलता।
- आर्थिक विकास दर अपेक्षाकृत धीमी।
- कृषि क्षेत्र की उपेक्षा।
- कांग्रेस में वंशवाद एवं गुटवाद को बल।
9. 1967 के चुनाव एवं गठबंधन की राजनीति
1967 के चुनाव की पृष्ठभूमि
- 1964 में नेहरू का निधन।
- 1965 में लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने।
- 1965 में भारत-पाक युद्ध।
- 1966 में ताशकंद समझौता एवं शास्त्री का निधन।
- इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं।
- 1966–67 में भयंकर सूखा एवं खाद्यान्न संकट।
- रुपये का अवमूल्यन (1966)।
- भाषा आंदोलन एवं क्षेत्रीय अस्मिता का उभार।
1967 के चुनाव परिणाम
- कांग्रेस को लोकसभा में पहली बार बड़ा झटका लगा।
- कांग्रेस की सीटें 364 से घटकर 283 हो गईं।
- अनेक राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा।
- पश्चिम बंगाल, केरल, उड़ीसा, मद्रास, पंजाब आदि राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं।
- इसे “1967 का राजनीतिक भूकंप” कहा जाता है।
गठबंधन की राजनीति का उदय
- 1967 के बाद गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ।
- विभिन्न विपक्षी दलों ने मिलकर सरकारें बनाईं।
- संयुक्त विधायक दल (SVD) सरकारें बनीं।
- यह भारतीय राजनीति में गठबंधन युग की शुरुआत थी।
- कांग्रेस के प्रभुत्व का पहला बड़ा आघात था।
10. कांग्रेस का विभाजन (1969)
पृष्ठभूमि
- 1967 के चुनावों के बाद कांग्रेस के भीतर गुटबाजी तेज हो गई।
- इंदिरा गांधी एवं पुराने कांग्रेसी नेताओं (सिंडिकेट) के बीच टकराव बढ़ा।
- सिंडिकेट — कांग्रेस के पुराने नेताओं का समूह (के. कामराज, मोरारजी देसाई, एस.के. पाटिल, नीलम संजीव रेड्डी, अतुल्य घोष)।
- 1969 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान टकराव खुलकर सामने आया।
राष्ट्रपति चुनाव (1969)
- सिंडिकेट ने नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया।
- इंदिरा गांधी ने वी.वी. गिरि को समर्थन दिया।
- वी.वी. गिरि राष्ट्रपति चुनाव जीत गए।
- इसके बाद कांग्रेस में विभाजन अनिवार्य हो गया।
कांग्रेस का विभाजन
- कांग्रेस (O) — ऑर्गनाइजेशन — सिंडिकेट का गुट (मोरारजी देसाई आदि)।
- कांग्रेस (R) — रिक्विजिशनिस्ट — इंदिरा गांधी का गुट।
- चुनाव आयोग ने इंदिरा गांधी के गुट को “असली कांग्रेस” माना।
- इंदिरा गांधी के गुट को “कांग्रेस (R)” एवं चुनाव चिह्न “गाय एवं बछड़ा” मिला।
- इस विभाजन ने इंदिरा गांधी की स्थिति को मजबूत किया।
11. 1971 के लोकसभा चुनाव
पृष्ठभूमि
- 1969 के विभाजन के बाद इंदिरा गांधी ने 1970 में लोकसभा भंग कर दी।
- 1971 में मध्यावधि चुनाव हुए।
- इंदिरा गांधी ने जनता के सामने सीधा जनसंपर्क बनाया।
- उनका नारा था — “गरीबी हटाओ” (Garibi Hatao)।
चुनाव परिणाम
- इंदिरा गांधी की कांग्रेस (R) ने भारी जीत हासिल की।
- कांग्रेस (R) को 352 सीटें मिलीं।
- कांग्रेस (O) को केवल 16 सीटें मिलीं।
- जनसंघ को 22 सीटें मिलीं।
- CPI को 23 सीटें मिलीं।
1971 के चुनाव का महत्व
- इंदिरा गांधी की नेतृत्व क्षमता सिद्ध हुई।
- “गरीबी हटाओ” का नारा जनता से जुड़ा।
- व्यक्तिगत लोकप्रियता एवं चुनावी रणनीति का महत्व बढ़ा।
- इस चुनाव के बाद 1971 में भारत-पाक युद्ध एवं बांग्लादेश का जन्म हुआ।
12. 1975 का आपातकाल
पृष्ठभूमि
- 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी को भारी जनसमर्थन मिला।
- परंतु 1973 में आर्थिक संकट (तेल संकट, महँगाई, बेरोजगारी) गहरा हुआ।
- छात्र आंदोलन, मजदूर आंदोलन एवं जयप्रकाश नारायण का आंदोलन तेज हुआ।
- 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया।
- इसके बाद विपक्ष ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की।
- 25 जून 1975 को राष्ट्रपति ने आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी।
आपातकाल की घोषणा के कारण
- राजनीतिक अस्थिरता एवं विरोध प्रदर्शन।
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय।
- जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में “संपूर्ण क्रांति” का आंदोलन।
- सरकार की सुरक्षा एवं स्थिरता का तर्क।
आपातकाल के प्रभाव
- नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित कर दी गईं।
- अनेक विपक्षी नेता जेल में डाल दिए गए।
- अखबारों पर सेंसरशिप लगाई गई।
- संसद के कई अधिकार सीमित किए गए।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हुई।
- जनता में भय एवं असंतोष फैला।
आपातकाल के सकारात्मक पहलू
- महँगाई पर नियंत्रण हुआ।
- कानून-व्यवस्था में सुधार हुआ।
- अनुशासन एवं प्रशासनिक दक्षता बढ़ी।
- कुछ विकास कार्यक्रम प्रभावी ढंग से लागू हुए।
13. 1977 का चुनाव एवं जनता पार्टी
जनता पार्टी का गठन
- आपातकाल के बाद विपक्षी दलों ने एकजुट होकर जनता पार्टी का गठन किया।
- जनता पार्टी में जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, कांग्रेस (O), भारतीय लोक दल, स्वतंत्र पार्टी आदि शामिल हुए।
- जनता पार्टी के नेता मोरारजी देसाई थे।
- जयप्रकाश नारायण इस आंदोलन के प्रेरणास्रोत थे।
1977 के चुनाव परिणाम
- यह चुनाव आपातकाल के बाद हुआ।
- जनता पार्टी ने भारी जीत हासिल की।
- कांग्रेस पहली बार केंद्र में सत्ता से बाहर हुई।
- इंदिरा गांधी एवं संजय गांधी चुनाव हार गए।
- मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।
जनता पार्टी सरकार की उपलब्धियाँ
- आपातकाल के दौरान लगाए गए प्रतिबंध हटाए गए।
- नागरिक स्वतंत्रताएँ बहाल की गईं।
- संविधान में 44वाँ संशोधन करके आपातकाल के दुरुपयोग पर रोक लगाई गई।
- मंडल आयोग का गठन (1979)।
- पंचायती राज को बल दिया गया।
जनता पार्टी सरकार की विफलताएँ
- आंतरिक गुटबाजी एवं मतभेद।
- नेतृत्व संकट।
- अल्पमत में आने के बाद 1979 में सरकार गिर गई।
- चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने, परंतु वे भी अधिक समय तक नहीं टिक सके।
- 1980 में लोकसभा भंग कर दी गई।
14. 1980 एवं 1984 के चुनाव
1980 का लोकसभा चुनाव
- जनता पार्टी सरकार की विफलता के बाद 1980 में चुनाव हुए।
- इंदिरा गांधी की कांग्रेस ने भारी जीत हासिल की।
- इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं।
- कांग्रेस को 353 सीटें मिलीं।
- जनता पार्टी (जनता दल) को केवल 31 सीटें मिलीं।
1984 का लोकसभा चुनाव
- 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई।
- इसके बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने।
- 1984 के चुनाव में कांग्रेस को भारी सहानुभूति लहर का लाभ मिला।
- कांग्रेस को 414 सीटें मिलीं — यह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।
- राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने।
1984 के चुनाव का महत्व
- यह कांग्रेस की अंतिम बड़ी जीत थी।
- इसके बाद कांग्रेस का प्रभुत्व कम होने लगा।
- 1989 के चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा।
- गठबंधन युग की शुरुआत हुई।
15. कांग्रेस प्रणाली का पतन
पतन के कारण
- आंतरिक गुटबाजी एवं नेतृत्व संकट — कांग्रेस में गुटवाद बढ़ा और नेतृत्व कमजोर हुआ।
- भ्रष्टाचार — सरकार में भ्रष्टाचार के आरोप बढ़े (बोफोर्स कांड)।
- जनता का असंतोष — महँगाई, बेरोजगारी एवं आर्थिक असमानता।
- क्षेत्रीय दलों का उदय — तमिलनाडु, पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक आदि में क्षेत्रीय दलों का उभार।
- मंडल आयोग एवं कमंडल — सामाजिक एवं धार्मिक ध्रुवीकरण।
- गठबंधन की राजनीति — 1989 के बाद गठबंधन सरकारों का दौर।
- वैचारिक कमजोरी — कांग्रेस की विचारधारा अस्पष्ट हो गई।
- जनसंघर्ष — शाह बानो प्रकरण, अयोध्या विवाद आदि।
पतन के परिणाम
- 1989 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा।
- गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ।
- क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ी।
- राजनीति में अस्थिरता बढ़ी।
- भारतीय राजनीति में “गठबंधन युग” की शुरुआत हुई।
16. महत्वपूर्ण तिथियाँ एवं तथ्य
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1950 | संविधान लागू, भारत गणराज्य बना |
| 1951–52 | प्रथम आम चुनाव (कांग्रेस को 364 सीटें) |
| 1952 | प्रथम लोकसभा का गठन, नेहरू प्रधानमंत्री |
| 1956 | द्वितीय आम चुनाव (कांग्रेस को 371 सीटें) |
| 1962 | तृतीय आम चुनाव (कांग्रेस को 361 सीटें) |
| 1962 | भारत-चीन युद्ध |
| 1964 | नेहरू का निधन, लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री |
| 1965 | भारत-पाक युद्ध |
| 1966 | ताशकंद समझौता, शास्त्री का निधन, इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री |
| 1967 | चतुर्थ आम चुनाव — कांग्रेस को झटका (283 सीटें), गठबंधन युग की शुरुआत |
| 1969 | कांग्रेस का विभाजन (कांग्रेस R एवं कांग्रेस O), बैंकों का राष्ट्रीयकरण |
| 1971 | लोकसभा चुनाव — इंदिरा गांधी की भारी जीत, “गरीबी हटाओ” नारा |
| 1971 | भारत-पाक युद्ध, बांग्लादेश का जन्म |
| 1975 | इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय, 25 जून को आपातकाल की घोषणा |
| 1977 | आपातकाल के बाद चुनाव, जनता पार्टी की जीत, मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री |
| 1979 | जनता पार्टी सरकार का पतन, चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री |
| 1980 | लोकसभा चुनाव, इंदिरा गांधी की वापसी |
| 1984 | इंदिरा गांधी की हत्या, राजीव गांधी प्रधानमंत्री, कांग्रेस को 414 सीटें |
| 1989 | कांग्रेस की हार, गठबंधन सरकार का दौर शुरू |
- प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त — सुकुमार सेन
- प्रथम लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिलीं — 364 सीटें
- “कांग्रेस प्रणाली” शब्द के प्रतिपादक — रजनी कोठारी
- कांग्रेस का विभाजन — 1969
- आपातकाल की अवधि — 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977
- 1977 में प्रधानमंत्री बने — मोरारजी देसाई
- 1984 में कांग्रेस को मिलीं — 414 सीटें (सर्वाधिक)
- “गरीबी हटाओ” का नारा — इंदिरा गांधी (1971)
17. महत्वपूर्ण प्रश्न (परीक्षा के लिए)
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (1 अंक)
- प्रथम आम चुनाव कब हुआ? (1951–52)
- प्रथम आम चुनाव में कांग्रेस को कितनी सीटें मिलीं? (364)
- “कांग्रेस प्रणाली” शब्द किसने दिया? (रजनी कोठारी)
- कांग्रेस का विभाजन कब हुआ? (1969)
- आपातकाल की घोषणा कब हुई? (25 जून 1975)
- 1977 में प्रधानमंत्री कौन बने? (मोरारजी देसाई)
- “गरीबी हटाओ” का नारा किसने दिया? (इंदिरा गांधी)
- जनता पार्टी का गठन कब हुआ? (1977)
- 1967 के चुनाव को क्या कहा जाता है? (राजनीतिक भूकंप)
- प्रथम मुख्य निर्वाचन आयुक्त कौन थे? (सुकुमार सेन)
लघु उत्तरीय प्रश्न (2–3 अंक)
- एक दल के प्रभुत्व से आप क्या समझते हैं?
- कांग्रेस के प्रभुत्व के चार कारण बताइए।
- गुटवाद क्या है? कांग्रेस में इसके प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
- 1967 के चुनाव को “राजनीतिक भूकंप” क्यों कहा जाता है?
- कांग्रेस के विभाजन (1969) के कारण बताइए।
- आपातकाल के प्रमुख प्रभावों का वर्णन करें।
- जनता पार्टी सरकार की विफलताओं को स्पष्ट कीजिए।
- “नेहरू युग” की विशेषताएँ बताइए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)
- भारत में एक दल के प्रभुत्व के दौर की विशेषताओं एवं कारणों की विवेचना करें।
- कांग्रेस प्रणाली के स्वरूप एवं विशेषताओं को स्पष्ट करें।
- 1967 के आम चुनाव के परिणामों एवं महत्व का वर्णन करें।
- 1969 के कांग्रेस विभाजन के कारणों एवं परिणामों की व्याख्या करें।
- आपातकाल (1975–77) के कारणों एवं प्रभावों का मूल्यांकन करें।
- कांग्रेस प्रणाली के पतन के कारणों की विवेचना करें।
दीर्घ निबंधात्मक प्रश्न (8–10 अंक)
- “भारत में 1952 से 1967 तक कांग्रेस का प्रभुत्व रहा” — इस कथन की विवेचना करें तथा कारण स्पष्ट करें।
- भारतीय राजनीति में “एक दल के प्रभुत्व के दौर” की विशेषताओं, उपलब्धियों एवं सीमाओं का मूल्यांकन करें।
- 1967 से 1989 तक भारतीय राजनीति में आए परिवर्तनों की विवेचना करें।
- तिथियों (1952, 1967, 1969, 1975, 1977, 1984) को अच्छी तरह याद करें।
- तुलनात्मक प्रश्नों में सारणी बनाकर उत्तर लिखें — अंक अधिक मिलते हैं।
- “कांग्रेस प्रणाली”, “गुटवाद”, “आपातकाल” एवं “जनता पार्टी” से हर वर्ष प्रश्न आते हैं।
- उत्तर में तथ्य एवं उदाहरण अवश्य लिखें।
- नेहरू युग एवं इंदिरा युग की तुलना करके समझें।
