कक्षा 12 राजनीति विज्ञान – अध्याय 8: पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन
पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन मानव जीवन के आधार हैं। पर्यावरण का तात्पर्य उन सभी भौतिक, रासायनिक और जैविक तत्वों से है जो मानव और अन्य जीवों को घेरते हैं। प्राकृतिक संसाधन वे संसाधन हैं जो प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं। परंतु, मानवीय गतिविधियों के कारण पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे अनेक वैश्विक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
इस अध्याय में हम पर्यावरणीय समस्याओं, प्राकृतिक संसाधनों के प्रकार, संसाधनों के उपयोग तथा संरक्षण, वैश्विक पर्यावरणीय समझौतों तथा भारत की पर्यावरण नीति का विस्तृत अध्ययन करेंगे। यह अध्याय समकालीन विश्व की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक को समझने में सहायता करता है।
इस अध्याय का शीर्षक “पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन” इसलिए रखा गया है क्योंकि यह अध्याय पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है।
1. पर्यावरण का अर्थ एवं महत्व
1.1 पर्यावरण क्या है?
पर्यावरण का तात्पर्य उन सभी भौतिक, रासायनिक, जैविक और सामाजिक कारकों की समग्रता से है जो मानव और अन्य जीवों को प्रभावित करते हैं। यह प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों तत्वों को शामिल करता है।
1.2 पर्यावरण के घटक
- भौतिक पर्यावरण – भूमि, जल, वायु, खनिज।
- जैविक पर्यावरण – पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव।
- सामाजिक पर्यावरण – संस्कृति, परंपराएँ, सामाजिक संस्थाएँ।
- मानव निर्मित पर्यावरण – शहर, सड़क, उद्योग।
1.3 पर्यावरण का महत्व
- यह मानव जीवन का आधार है।
- यह जैव विविधता को संरक्षित रखता है।
- यह पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखता है।
- यह जलवायु को नियंत्रित करता है।
- यह प्राकृतिक संसाधन प्रदान करता है।
- यह मानव स्वास्थ्य और कल्याण के लिए आवश्यक है।
2. प्राकृतिक संसाधन
2.1 प्राकृतिक संसाधन का अर्थ
प्राकृतिक संसाधन वे संसाधन हैं जो प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं और जिनका उपयोग मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करता है। ये संसाधन मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
2.2 प्राकृतिक संसाधनों का वर्गीकरण
उपलब्धता के आधार पर
- नवीकरणीय संसाधन – सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल, वन।
- अनवीकरणीय संसाधन – कोयला, पेट्रोलियम, खनिज।
उत्पत्ति के आधार पर
- जैविक संसाधन – वन, वन्यजीव, मत्स्य।
- अजैविक संसाधन – खनिज, धातु, जल।
विकास के आधार पर
- संभाव्य संसाधन – जिनका उपयोग भविष्य में संभव है।
- विकसित संसाधन – जिनका उपयोग हो रहा है।
- संचित संसाधन – जिनका भविष्य के लिए संग्रह किया गया है।
2.3 प्रमुख प्राकृतिक संसाधन
- वन संसाधन – लकड़ी, गोंद, औषधियाँ।
- जल संसाधन – नदियाँ, झीलें, भूमिगत जल।
- खनिज संसाधन – लोहा, कोयला, बॉक्साइट।
- ऊर्जा संसाधन – कोयला, पेट्रोलियम, सौर ऊर्जा।
- मृदा संसाधन – उपजाऊ मिट्टी।
- वन्यजीव संसाधन – जानवर, पक्षी, मछलियाँ।
3. पर्यावरणीय समस्याएँ
3.1 वायु प्रदूषण
- वायुमंडल में हानिकारक गैसों और कणों के मिलने से वायु प्रदूषण होता है।
- मुख्य कारण – उद्योग, वाहन, निर्माण कार्य, जीवाश्म ईंधन।
- प्रभाव – श्वसन रोग, हृदय रोग, अम्लीय वर्षा, ग्लोबल वार्मिंग।
3.2 जल प्रदूषण
- जल में हानिकारक पदार्थों के मिलने से जल प्रदूषण होता है।
- मुख्य कारण – औद्योगिक कचरा, सीवेज, कृषि रसायन।
- प्रभाव – जलजनित रोग, जलीय जीवों का विनाश।
3.3 भूमि क्षरण
- भूमि की उत्पादकता में कमी को भूमि क्षरण कहते हैं।
- मुख्य कारण – वनों की कटाई, अति चराई, अति सिंचाई।
- प्रभाव – मरुस्थलीकरण, कृषि उत्पादन में कमी।
3.4 वनों की कटाई
- वन क्षेत्र में कमी को वनों की कटाई कहते हैं।
- मुख्य कारण – कृषि विस्तार, शहरीकरण, उद्योग, सड़क निर्माण।
- प्रभाव – जैव विविधता की हानि, जलवायु परिवर्तन, मिट्टी का कटाव।
3.5 जलवायु परिवर्तन
- ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से वैश्विक तापमान बढ़ रहा है।
- मुख्य गैसें – कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड।
- प्रभाव – समुद्र स्तर में वृद्धि, ग्लेशियरों का पिघलना, अनियमित वर्षा।
3.6 ओजोन परत का क्षरण
- क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) से ओजोन परत क्षरित हो रही है।
- प्रभाव – पराबैंगनी किरणों का पृथ्वी पर पहुँचना।
- परिणाम – त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद, प्रतिरक्षा प्रणाली पर प्रभाव।
3.7 जैव विविधता की हानि
- प्रजातियों का विलुप्त होना जैव विविधता की हानि है।
- कारण – आवास विनाश, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन।
- प्रभाव – पारिस्थितिकी असंतुलन।
4. पर्यावरणीय समस्याओं के कारण
4.1 जनसंख्या वृद्धि
- बढ़ती जनसंख्या संसाधनों पर दबाव डालती है।
- इससे प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है।
- प्रदूषण और कचरा बढ़ता है।
4.2 औद्योगीकरण
- उद्योगों से प्रदूषण होता है।
- औद्योगिक कचरा जल और भूमि को प्रदूषित करता है।
- जीवाश्म ईंधन का अत्यधिक उपयोग होता है।
4.3 शहरीकरण
- शहरों का अनियोजित विस्तार।
- हरित क्षेत्र में कमी।
- कचरा प्रबंधन की समस्या।
4.4 अत्यधिक उपभोग
- विकसित देशों में अत्यधिक उपभोग।
- संसाधनों का अपव्यय।
- कचरे की अधिकता।
4.5 गरीबी
- गरीबी के कारण लोग पर्यावरण की परवाह नहीं करते।
- वे वनों पर निर्भर रहते हैं।
- संसाधनों का अविवेकपूर्ण उपयोग करते हैं।
5. पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान
5.1 सतत विकास
- सतत विकास वह विकास है जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों दोनों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
- ब्रुंटलैंड आयोग (1987) ने इस अवधारणा को प्रस्तुत किया।
- यह आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन बनाता है।
5.2 संसाधन संरक्षण
- संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग।
- पुनःचक्रण (Recycling)।
- नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग।
- ऊर्जा दक्षता में सुधार।
5.3 पर्यावरण संरक्षण
- वृक्षारोपण।
- प्रदूषण नियंत्रण।
- जैव विविधता संरक्षण।
- वन्यजीव संरक्षण।
- जन जागरूकता।
5.4 अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
- स्टॉकहोम सम्मेलन (1972)।
- रियो सम्मेलन (1992)।
- क्योटो प्रोटोकॉल (1997)।
- पेरिस समझौता (2015)।
6. वैश्विक पर्यावरणीय समझौते
6.1 स्टॉकहोम सम्मेलन (1972)
- यह पर्यावरण पर पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन था।
- इसमें 113 देशों ने भाग लिया।
- इसमें ‘मानव पर्यावरण की घोषणा’ अपनाई गई।
- इसने UNEP (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम) की स्थापना की सिफारिश की।
- 5 जून को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ घोषित किया गया।
6.2 मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (1987)
- यह ओजोन परत के संरक्षण के लिए था।
- इसमें CFC के उत्पादन और उपयोग को प्रतिबंधित किया गया।
- यह एक सफल अंतर्राष्ट्रीय समझौता रहा।
6.3 रियो सम्मेलन (1992)
- इसे ‘पृथ्वी शिखर सम्मेलन’ भी कहा जाता है।
- इसमें 172 देशों ने भाग लिया।
- इसमें जलवायु परिवर्तन संधि (UNFCCC) अपनाई गई।
- इसमें जैव विविधता संधि पर हस्ताक्षर हुए।
- इसमें ‘एजेंडा 21’ अपनाया गया।
6.4 क्योटो प्रोटोकॉल (1997)
- यह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए था।
- विकसित देशों के लिए उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए।
- अमेरिका ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए।
- भारत और चीन जैसे विकासशील देशों पर अनिवार्य लक्ष्य नहीं थे।
- 2020 में इसका कार्यकाल समाप्त हो गया।
6.5 पेरिस समझौता (2015)
- यह जलवायु परिवर्तन पर एक वैश्विक समझौता है।
- इसका लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से कम रखना है।
- 195 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए।
- भारत ने भी इस पर हस्ताक्षर किए।
- इसमें सभी देशों के लिए स्वैच्छिक लक्ष्य निर्धारित करने की बात कही गई।
- अमेरिका ने 2020 में इस समझौते से बाहर निकलने का फैसला किया, लेकिन 2021 में पुनः शामिल हो गया।
7. भारत की पर्यावरण नीति
7.1 संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 48A – राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करेगा।
- अनुच्छेद 51A(g) – नागरिकों का कर्तव्य है कि वे पर्यावरण की रक्षा करें।
- 42वें संशोधन (1976) द्वारा ये प्रावधान जोड़े गए।
7.2 प्रमुख पर्यावरण कानून
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) – वन्यजीवों की रक्षा।
- जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम (1974) – जल प्रदूषण रोकना।
- वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम (1981) – वायु प्रदूषण रोकना।
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986) – व्यापक पर्यावरण संरक्षण।
- जैव विविधता अधिनियम (2002) – जैव विविधता संरक्षण।
- वन अधिकार अधिनियम (2006) – वनवासियों के अधिकार।
7.3 प्रमुख अभियान एवं कार्यक्रम
- स्वच्छ भारत अभियान (2014)।
- नमामि गंगे (2014)।
- राष्ट्रीय सौर मिशन।
- ग्रीन इंडिया मिशन।
- जल जीवन मिशन (2019)।
- वन महोत्सव।
- राष्ट्रीय वायु शुद्धिकरण कार्यक्रम।
7.4 भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएँ
- 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 500 GW करने का लक्ष्य।
- 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य।
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की स्थापना।
- पेरिस समझौते के प्रति प्रतिबद्धता।
8. पर्यावरण और विकास का संबंध
8.1 विकास और पर्यावरण का द्वंद्व
- विकास के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है।
- संसाधनों का उपयोग पर्यावरण को प्रभावित करता है।
- विकासशील देशों को विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
- विकसित देशों ने अत्यधिक संसाधनों का उपयोग किया है।
8.2 सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व
- यह सिद्धांत पर्यावरणीय समझौतों में अपनाया गया।
- इसके अनुसार सभी देशों की पर्यावरण की रक्षा की जिम्मेदारी है।
- लेकिन विकसित देशों की जिम्मेदारी अधिक है, क्योंकि उन्होंने अधिक प्रदूषण किया है।
- विकासशील देशों को विकास के लिए अधिक स्थान मिलना चाहिए।
8.3 हरित अर्थव्यवस्था
- यह ऐसी अर्थव्यवस्था है जो पर्यावरण के अनुकूल हो।
- इसमें नवीकरणीय ऊर्जा, हरित प्रौद्योगिकी, सतत कृषि शामिल हैं।
- यह हरित रोजगार के अवसर पैदा करती है।
- यह गरीबी उन्मूलन और पर्यावरण संरक्षण दोनों में सहायक है।
9. महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
- पर्यावरण – वे सभी भौतिक, रासायनिक और जैविक तत्व जो मानव को घेरते हैं।
- प्राकृतिक संसाधन – प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध संसाधन।
- नवीकरणीय संसाधन – जो पुनः उत्पन्न हो सकते हैं।
- अनवीकरणीय संसाधन – जो पुनः उत्पन्न नहीं हो सकते।
- सतत विकास – विकास जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों दोनों की आवश्यकताओं की पूर्ति करे।
- जैव विविधता – पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवों की विविधता।
- ग्रीनहाउस प्रभाव – वायुमंडल में गैसों के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ना।
- मरुस्थलीकरण – उपजाऊ भूमि का मरुस्थल में बदलना।
- ओजोन परत – वायुमंडल की परत जो पराबैंगनी किरणों से बचाती है।
- हरित अर्थव्यवस्था – पर्यावरण के अनुकूल अर्थव्यवस्था।
10. महत्वपूर्ण तथ्य
- 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।
- स्टॉकहोम सम्मेलन 1972 में हुआ।
- रियो सम्मेलन 1992 में हुआ।
- क्योटो प्रोटोकॉल 1997 में हुआ।
- पेरिस समझौता 2015 में हुआ।
- ब्रुंटलैंड आयोग 1987 में सतत विकास की अवधारणा दी।
- भारत में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 में पारित हुआ।
- 42वें संशोधन (1976) द्वारा पर्यावरण संरक्षण संविधान में जोड़ा गया।
- भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है।
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की स्थापना भारत ने की।
- स्वच्छ भारत अभियान 2014 में शुरू हुआ।
- नमामि गंगे कार्यक्रम 2014 में शुरू हुआ।
11. निष्कर्ष
अध्याय 8 “पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन” पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह अध्याय हमें सिखाता है:
- पर्यावरण का अर्थ – यह वे सभी तत्व हैं जो मानव को घेरते हैं।
- प्राकृतिक संसाधन – ये प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं।
- पर्यावरणीय समस्याएँ – प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई।
- समाधान – सतत विकास, संसाधन संरक्षण, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग।
- वैश्विक समझौते – स्टॉकहोम, रियो, क्योटो, पेरिस।
- भारत की नीति – संवैधानिक प्रावधान, कानून, अभियान।
- हरित अर्थव्यवस्था – पर्यावरण के अनुकूल विकास।
इस अध्याय का महत्व:
- यह पर्यावरणीय समस्याओं को समझाता है।
- यह प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को स्पष्ट करता है।
- यह बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- यह भारत की पर्यावरण नीति को समझने में सहायक है।
- यह सतत विकास के महत्व को समझने में सहायक है।
इन नोट्स को अपनी परीक्षा की तैयारी के लिए उपयोग करें। सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को अच्छी तरह याद रखें और संभावित प्रश्नों का अभ्यास करें।
