कक्षा 12 इतिहास – अध्याय 1: ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ (हड़प्पा सभ्यता)
भारतीय उपमहाद्वीप की पहली ज्ञात नगरीय सभ्यता हड़प्पा सभ्यता है, जिसे सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। यह सभ्यता लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच विकसित हुई थी। इस अध्याय का नाम “ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ” इसलिए रखा गया है क्योंकि पुरातत्वविदों को इस सभ्यता के बारे में अधिकांश जानकारी इन्हीं तीन चीजों के माध्यम से प्राप्त हुई है – ईंटें (नगर निर्माण के प्रमाण), मनके (कला एवं व्यापार के प्रमाण) तथा अस्थियाँ (भोजन एवं जीवनशैली के प्रमाण)।
यह सभ्यता मुख्य रूप से पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर जानी जाती है, क्योंकि इस सभ्यता की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। इस अध्याय में हम हड़प्पा सभ्यता की खोज, नगर योजना, अर्थव्यवस्था, सामाजिक जीवन, धर्म, कला, लिपि तथा पतन के कारणों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
1. हड़प्पा सभ्यता की खोज एवं नामकरण
1.1 सभ्यता की खोज
हड़प्पा सभ्यता की खोज वर्ष 1921 में दयाराम साहनी ने की थी, जो उस समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारी थे। उन्होंने वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित हड़प्पा नामक स्थान पर उत्खनन किया। इसके बाद वर्ष 1922 में राखालदास बनर्जी ने सिंध प्रांत में मोहनजोदड़ो नामक स्थान की खोज की।
इन दोनों स्थलों की खोज ने पुरातत्व जगत में हलचल मचा दी, क्योंकि यह एक पूर्णतः अज्ञात सभ्यता के अवशेष थे। बाद में इन्हीं दो स्थलों के नाम पर इस पूरी सभ्यता को ‘हड़प्पा सभ्यता’ का नाम दिया गया।
1.2 सभ्यता का दूसरा नाम
हड़प्पा सभ्यता को ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ भी कहा जाता है, क्योंकि इस सभ्यता के अधिकांश स्थल सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे स्थित थे। सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की चार प्राचीन सभ्यताओं में से एक है, अन्य तीन हैं – मेसोपोटामिया की सभ्यता, मिस्र की सभ्यता और चीन की सभ्यता।
1.3 ‘संस्कृति’ शब्द का प्रयोग
पुरातत्वविद ‘संस्कृति’ शब्द का प्रयोग उन वस्तुओं के समूह के लिए करते हैं जो किसी विशेष क्षेत्र और समय में एक जैसी होती हैं। जब किसी स्थान से एक विशेष प्रकार की मिट्टी के बर्तन, औजार, आभूषण आदि एक साथ मिलते हैं, तो उसे एक संस्कृति का प्रमाण माना जाता है। हड़प्पा सभ्यता की अपनी विशिष्ट संस्कृति थी, जो उसकी मुहरों, मिट्टी के बर्तनों, ईंटों आदि से स्पष्ट होती है।
2. हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल
हड़प्पा सभ्यता के अवशेष वर्तमान भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में फैले हुए हैं। प्रमुख स्थल निम्नलिखित हैं:
2.1 हड़प्पा
हड़प्पा वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के तट पर स्थित है। यह इस सभ्यता का सर्वप्रथम खोजा गया केंद्र था। यहाँ से अनेक प्रकार की मुहरें, मिट्टी के बर्तन और ईंटें प्राप्त हुई हैं। यह स्थल अपनी अनाज-कोठियों के लिए भी प्रसिद्ध है।
2.2 मोहनजोदड़ो
मोहनजोदड़ो वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु नदी के तट पर स्थित है। ‘मोहनजोदड़ो’ शब्द का अर्थ ‘मुर्दों का टीला’ होता है। इसकी खोज राखालदास बनर्जी ने 1922 में की थी। यह लगभग 250 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है।
मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता का सबसे महत्वपूर्ण और विकसित नगर था। यहाँ से विशाल स्नानागार (ग्रेट बाथ) मिला है, जो इस सभ्यता की नगर योजना और सामाजिक जीवन का अद्भुत उदाहरण है। यहाँ एक विशाल अन्न-कोठी, सभागार तथा एक विद्यालय भवन के अवशेष भी मिले हैं।
2.3 कालीबंगन
कालीबंगन राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी के तट पर स्थित है। यह स्थल ‘काली बंगला’ यानी काले रंग के कंगन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ से हड़प्पा सभ्यता की सबसे प्राचीन बस्ती के प्रमाण मिले हैं। यहाँ एक प्राचीन हल के खेत के अवशेष भी मिले हैं, जो कृषि कार्यों का प्रमाण देते हैं। इसके अलावा यहाँ से अग्निकुंड भी मिले हैं, जो संभवतः धार्मिक अनुष्ठानों से संबंधित थे।
2.4 लोथल
लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले में साबरमती नदी की एक सहायक नदी के किनारे स्थित है। यह स्थल ‘गोदी’ (डॉकयार्ड) के लिए प्रसिद्ध है, जो समुद्री व्यापार का प्रमाण देता है। यहाँ से मनके बनाने की कार्यशालाएँ, मुहरें, ताँबे की वस्तुएँ तथा मछली पकड़ने के कांटे भी मिले हैं। लोथल की गोदी विश्व की सबसे प्राचीन गोदियों में से एक मानी जाती है।
2.5 धोलावीरा
धोलावीरा गुजरात के कच्छ जिले में स्थित है। यह हड़प्पा सभ्यता का एक प्रमुख स्थल है, जो अपनी जल प्रबंधन प्रणाली के लिए जाना जाता है। यहाँ बाँध, जलाशय तथा जल निकासी की उन्नत व्यवस्था मिली है।
2.6 अन्य महत्वपूर्ण स्थल
- चन्हुदड़ो – सिंध में स्थित, मनके बनाने का केंद्र।
- बनावली – हरियाणा में स्थित।
- राखीगढ़ी – हरियाणा में स्थित, भारत का सबसे बड़ा हड़प्पा स्थल।
- दैमाबाद – महाराष्ट्र में स्थित।
- आलमगीरपुर – उत्तर प्रदेश में स्थित।
3. हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना
हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना विश्व की सर्वश्रेष्ठ नगर योजनाओं में गिनी जाती है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
3.1 ग्रिड पद्धति
हड़प्पा के नगर ‘ग्रिड पद्धति’ पर बसे थे। इसका अर्थ है कि यहाँ की सड़कें एक-दूसरे को समकोण (90 डिग्री) पर काटती थीं। सड़कें पूर्व-पश्चिम एवं उत्तर-दक्षिण दिशा में बनी थीं, जिससे पूरा नगर आयताकार खंडों (ब्लॉक) में विभाजित हो जाता था।
3.2 दुर्ग एवं निचला नगर
हड़प्पा के प्रत्येक नगर दो भागों में विभाजित था:
- दुर्ग (सिटाडेल) – यह नगर का उच्चतर भाग था, जो ऊँचे चबूतरे पर बना था। यहाँ प्रशासनिक भवन, धार्मिक स्थल तथा महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन स्थित थे। दुर्ग की दीवारें मोटी एवं मजबूत होती थीं, जो नगर की सुरक्षा का कार्य करती थीं।
- निचला नगर – यह दुर्ग के नीचे स्थित आवासीय क्षेत्र था। यहाँ आम जनता के मकान, दुकानें तथा कार्यशालाएँ स्थित थीं।
3.3 सड़कें एवं गलियाँ
हड़प्पा नगरों की सड़कें काफी चौड़ी और सीधी होती थीं। मुख्य सड़कों की चौड़ाई 10 से 13 मीटर तक होती थी। गलियाँ संकरी होती थीं और मकानों के बीच से गुजरती थीं। सड़कों के किनारे दीवारें होती थीं, जो घरों को सड़क से अलग करती थीं।
3.4 जल निकासी प्रणाली
हड़प्पा सभ्यता की जल निकासी प्रणाली अत्यंत विकसित थी। यहाँ की नालियाँ पक्की ईंटों से बनी होती थीं और ढक्कनदार होती थीं। प्रत्येक घर से नालियाँ मुख्य नाली से जुड़ी होती थीं। नालियों को साफ रखने के लिए समय-समय पर मैला निकालने की व्यवस्था भी थी। मोहनजोदड़ो की नाली व्यवस्था विश्व की सबसे प्राचीन नाली व्यवस्थाओं में से एक है।
3.5 मकान
हड़प्पा नगरों के मकान पक्की ईंटों से बने होते थे। मकान दो या तीन मंजिला होते थे। प्रत्येक मकान में कमरे, रसोई, स्नानघर तथा आँगन होता था। अधिकांश मकानों में निजी कुएँ भी होते थे। मकानों में खिड़कियाँ सड़क की ओर नहीं बल्कि आँगन की ओर होती थीं, जिससे गोपनीयता बनी रहती थी।
4. हड़प्पा सभ्यता की अर्थव्यवस्था
4.1 कृषि
हड़प्पा सभ्यता की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि थी। हड़प्पा के किसान निम्नलिखित फसलें उगाते थे:
- अनाज – गेहूँ, जौ, चावल, दाल, सफेद चना, तिल और बाजरा।
- फल एवं सब्जियाँ – विभिन्न प्रकार के फल, पत्तियाँ आदि।
- दूध एवं दुग्ध उत्पाद – दूध, दही, घी आदि।
हड़प्पा के किसान हल का प्रयोग करते थे, जिसका प्रमाण कालीबंगन से मिले हल के खेतों से मिलता है। सिंचाई के लिए वे नहरों, कुओं एवं बाँधों का उपयोग करते थे।
4.2 पशुपालन
कृषि के अलावा पशुपालन भी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा था। हड़प्पा के लोग गाय, भेड़, बकरी, सूअर, भैंस आदि पशु पालते थे। पशुपालक (गड़रिये) दूध, मांस तथा ऊन प्रदान करते थे।
4.3 मछली पकड़ना
हड़प्पा के लोग मछली भी खाते थे, विशेषकर नदियों एवं समुद्र के किनारे बसी बस्तियों में। लोथल से मछली पकड़ने के कांटे मिले हैं। मछुआरे समुदाय भोजन सामग्री उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
4.4 उद्योग-धंधे
हड़प्पा सभ्यता में अनेक उद्योग-धंधे विकसित थे:
- मनका उद्योग – हड़प्पा सभ्यता मनकों (बीड्स) के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थी। मनके विभिन्न प्रकार की सामग्रियों – पत्थर, मिट्टी, सीप, हाथी दाँत, ताँबा, काँच, सेलखड़ी (स्टीटाइट) आदि से बनाए जाते थे। अधिकांश मनके सेलखड़ी के बने होते थे। लोथल तथा चन्हुदड़ो मनके बनाने के प्रमुख केंद्र थे।
- मृदभांड उद्योग – हड़प्पा के मिट्टी के बर्तन उच्च कोटि के होते थे, जिन पर सुंदर चित्रकारी की जाती थी।
- धातु उद्योग – हड़प्पा के लोग ताँबा (कॉपर) और काँसा (ब्रॉन्ज) का उपयोग करते थे। वे ताँबे के औजार, हथियार और बर्तन बनाते थे। लोहे का उपयोग उन्हें नहीं पता था।
4.5 व्यापार
हड़प्पा सभ्यता का व्यापार अत्यंत विस्तृत था।
- आंतरिक व्यापार – विभिन्न नगरों के बीच अनाज, मनके, बर्तन, धातु आदि का व्यापार होता था।
- विदेशी व्यापार – हड़प्पा के लोग मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) तथा अन्य पश्चिम एशियाई क्षेत्रों के साथ व्यापार करते थे। हड़प्पा की मुहरें मेसोपोटामिया में मिली हैं, जो इस व्यापार का प्रमाण हैं।
- व्यापार के साधन – व्यापार के लिए नावों का उपयोग किया जाता था (लोथल की गोदी इसका प्रमाण है)। स्थल मार्ग से व्यापार के लिए बैलगाड़ियों का उपयोग होता था।
- वजन एवं माप – हड़प्पा के लोगों के पास वजन और माप की एक मानक प्रणाली थी। वजन चूना पत्थर, सेलखड़ी आदि से बने होते थे। ये वजन घनाकार या गोलाकार होते थे।
5. हड़प्पा सभ्यता के भोजन एवं आहार
हड़प्पा नगरों में लोगों को विविध प्रकार का भोजन उपलब्ध था:
5.1 अनाज एवं खाद्य पदार्थ
- गेहूँ – मुख्य भोजन।
- जौ – महत्वपूर्ण अनाज।
- चावल – कुछ क्षेत्रों में।
- दालें – विभिन्न प्रकार।
- सफेद चना – महत्वपूर्ण खाद्य।
- तिल – तेल के लिए।
- बाजरा – कुछ क्षेत्रों में।
5.2 पेड़-पौधों से प्राप्त उत्पाद
- फल – विभिन्न प्रकार।
- पत्तियाँ – सब्जी के रूप में।
5.3 पशु उत्पाद
- दूध एवं दुग्ध उत्पाद (दही, घी आदि)।
- मांस – भेड़, बकरी, सूअर आदि का।
- मछली – विशेष रूप से।
6. हड़प्पा सभ्यता के सामाजिक-आर्थिक पहलू
6.1 सामाजिक भिन्नताएँ
पुरातत्वविद हड़प्पाई समाज में सामाजिक भिन्नताओं का पता शवाधानों (दफन स्थलों) और विलासिता की वस्तुओं के आधार पर लगाते हैं।
- शवाधानों में भिन्नता – हड़प्पा के लोग अपने मृतकों को गड्ढों में दफनाते थे। कुछ कब्रों से मिट्टी के बर्तन और आभूषण मिले हैं, जबकि कुछ कब्रों में ये वस्तुएँ नहीं मिलतीं। यह सामाजिक स्तरीकरण को दर्शाता है। धनी लोगों की कब्रों में अधिक आभूषण और बर्तन रखे जाते थे।
- आभूषण – आभूषण स्त्री और पुरुष दोनों के धनी लोगों की कब्रों से मिले हैं। इससे पता चलता है कि स्त्रियाँ और पुरुष दोनों ही आभूषण पहनते थे।
6.2 आर्थिक भिन्नताएँ
आर्थिक भिन्नताओं का पता घरों के आकार, मिलने वाली वस्तुओं तथा कार्यशालाओं के आधार पर लगाया जाता है। कुछ मकान बड़े और अधिक सुविधायुक्त थे, तो कुछ छोटे। कुछ लोगों के पास अधिक संपत्ति थी, जैसे आभूषण, बर्तन आदि।
6.3 विलासिता की वस्तुएँ
विलासिता की वस्तुओं में मनके, आभूषण, सुंदर मिट्टी के बर्तन, मुहरें आदि शामिल थे। ये वस्तुएँ धनी वर्ग की पहचान थीं।
7. हड़प्पा सभ्यता की कला एवं संस्कृति
7.1 मुहरें
हड़प्पा सभ्यता की मुहरें इसकी सबसे विशिष्ट कलाकृतियाँ हैं। ये मुहरें अधिकतर सेलखड़ी (स्टीटाइट) की बनी होती थीं। इन पर जानवरों (बैल, गैंडा, हाथी, बाघ, मगरमच्छ आदि) और मानव आकृतियाँ उत्कीर्ण होती थीं। कुछ मुहरों पर लिपि भी अंकित होती थी, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है।
सबसे प्रसिद्ध मुहर ‘पशुपति मुहर’ है, जो मोहनजोदड़ो से मिली है। इस पर एक योगी (संभवतः शिव) की आकृति बनी है, जो तीन मुखों वाली तथा सींग धारण किए हुए है। इसके चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा तथा भैंस की आकृतियाँ हैं।
7.2 मनके
हड़प्पा सभ्यता मनका निर्माण में निपुण थी। मनके विभिन्न सामग्रियों से बनाए जाते थे – सेलखड़ी, पत्थर, सीप, हाथी दाँत, ताँबा, काँच, मिट्टी आदि। मनकों में छेद करने के लिए विशेष उपकरणों का उपयोग किया जाता था, जो लोथल, चन्हुदड़ो तथा धोलावीरा से मिले हैं।
7.3 मृदभांड
हड़प्पा के मिट्टी के बर्तन चाक पर बनाए जाते थे। इन पर सुंदर रंगीन चित्रकारी की जाती थी। बर्तनों पर ज्यामितीय आकृतियाँ, पक्षियों, जानवरों तथा पौधों के चित्र बनाए जाते थे।
7.4 धातु कला
हड़प्पा के लोग ताँबे और काँसे की वस्तुएँ बनाते थे। उन्होंने ताँबे के चाकू, भालों के फल, कुल्हाड़ी, दर्पण तथा मूर्तियाँ बनाईं। ‘नृत्य करती हुई कन्या’ की काँसे की मूर्ति मोहनजोदड़ो से मिली है, जो उनकी कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
7.5 पत्थर की मूर्तियाँ
हड़प्पा सभ्यता में पत्थर की मूर्तियाँ भी बनाई जाती थीं। इनमें ‘पशुपति’ की मूर्ति, ‘पुरुष धड़’ आदि प्रमुख हैं।
8. हड़प्पा सभ्यता की लिपि
हड़प्पा सभ्यता की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। यही कारण है कि हड़प्पा सभ्यता को ‘आद्य-ऐतिहासिक काल’ (प्रोटो-हिस्टोरिक) में रखा गया है।
8.1 लिपि की विशेषताएँ
- हड़प्पा लिपि चित्रात्मक (पिक्टोग्राफिक) थी, अर्थात प्रत्येक चिह्न किसी वस्तु या ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता था।
- यह लिपि दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी (अधिकांश लेखों से यह सिद्ध होता है)।
- यह लिपि मुख्यतः मुहरों पर पाई गई है।
- कुल मिलाकर लगभग 400-450 चिह्न हैं।
- अब तक कोई द्विभाषी अभिलेख (बाइलिंगुअल) नहीं मिला है, जिससे लिपि को पढ़ने में सहायता मिलती।
8.2 लिपि न पढ़े जाने के कारण
- अभिलेख बहुत छोटे हैं – अधिकतम 26 चिह्नों तक।
- कोई द्विभाषी अभिलेख नहीं मिला।
- लिपि की भाषा का निर्धारण नहीं हो पाया है।
9. हड़प्पा सभ्यता का धर्म
9.1 पशुपति की पूजा
मोहनजोदड़ो से प्राप्त पशुपति मुहर में एक योगी की आकृति है, जो त्रिमुख तथा सींगधारी है। इसके चारों ओर जानवर हैं। कुछ विद्वान इसे शिव का प्रारंभिक रूप मानते हैं।
9.2 मातृ देवी की पूजा
हड़प्पा सभ्यता में मातृ देवी की पूजा होती थी। कई मिट्टी की स्त्री मूर्तियाँ मिली हैं, जो संभवतः उर्वरता की देवी थीं।
9.3 प्रकृति पूजा
हड़प्पा के लोग वृक्षों (विशेषकर पीपल), जानवरों (बैल, गैंडा, हाथी, बाघ आदि) तथा प्राकृतिक शक्तियों (सूर्य, जल आदि) की पूजा करते थे।
9.4 योनि-लिंग पूजा
कुछ पुरातात्विक साक्ष्य योनि-लिंग पूजा के भी मिलते हैं, जो बाद के हिंदू धर्म में दिखाई देता है।
10. हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण
हड़प्पा सभ्यता का पतन लगभग 1900 ईसा पूर्व के आसपास हो गया था। इसके पतन के विभिन्न कारण बताए जाते हैं:
10.1 जलवायु परिवर्तन
कुछ विद्वानों के अनुसार जलवायु परिवर्तन (सूखा) के कारण यह सभ्यता समाप्त हो गई। वर्षा कम होने से कृषि प्रभावित हुई और लोगों को भोजन की कमी हो गई।
10.2 नदियों का मार्ग बदलना
सिंधु नदी तथा उसकी सहायक नदियों के मार्ग बदलने से बस्तियाँ प्रभावित हुईं। कुछ स्थल (जैसे कालीबंगन) घग्घर नदी के सूख जाने के कारण समाप्त हो गए।
10.3 भूकंप
कुछ पुरातत्वविद भूकंप को पतन का कारण मानते हैं। मोहनजोदड़ो में भूकंप के प्रमाण मिले हैं।
10.4 बाढ़
बाढ़ के कारण भी कई बस्तियाँ नष्ट हुईं, विशेषकर सिंधु नदी के किनारे बसी बस्तियाँ।
10.5 विदेशी आक्रमण
कुछ विद्वान आर्यों के आक्रमण को हड़प्पा सभ्यता के पतन का कारण मानते हैं, हालाँकि इसका कोई निश्चित पुरातात्विक प्रमाण नहीं है।
10.6 पारिस्थितिक असंतुलन
अत्यधिक जनसंख्या, वनों की कटाई, मिट्टी का क्षरण आदि पारिस्थितिक असंतुलन के कारण भी यह सभ्यता समाप्त हो सकती है।
10.7 व्यापार में कमी
मेसोपोटामिया के साथ व्यापार कम होने से आर्थिक गिरावट आई।
11. हड़प्पा सभ्यता का महत्व
11.1 भारतीय इतिहास में स्थान
हड़प्पा सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप की प्रथम नगरीय सभ्यता है। यह हमें बताती है कि भारत में सभ्यता की शुरुआत वैदिक काल से पहले ही हो चुकी थी।
11.2 नगर योजना की देन
हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना, जल निकासी प्रणाली एवं सार्वजनिक स्वच्छता व्यवस्था विश्व में अद्वितीय थी।
11.3 व्यापार एवं अर्थव्यवस्था
यह सभ्यता हमें प्राचीन काल में व्यापार, वाणिज्य तथा अर्थव्यवस्था के बारे में बहुमूल्य जानकारी देती है।
11.4 कला एवं संस्कृति
हड़प्पा की मुहरें, मनके, मृदभांड तथा मूर्तियाँ प्राचीन भारतीय कला एवं संस्कृति का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
11.5 सामाजिक संरचना
हड़प्पा सभ्यता हमें प्राचीन समाज की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना के बारे में जानकारी देती है।
12. महत्वपूर्ण तथ्य एवं परिभाषाएँ
12.1 महत्वपूर्ण तिथियाँ
- हड़प्पा सभ्यता का काल – लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व।
- हड़प्पा की खोज – 1921 (दयाराम साहनी)।
- मोहनजोदड़ो की खोज – 1922 (राखालदास बनर्जी)।
12.2 महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
- संस्कृति – पुरातत्वविद ‘संस्कृति’ शब्द का प्रयोग उन वस्तुओं के समूह के लिए करते हैं जो किसी विशेष क्षेत्र और समय में एक जैसी होती हैं।
- आद्य-ऐतिहासिक काल – वह काल जिसमें सभ्यता तो विकसित हो गई थी, किंतु उसकी लिपि को पढ़ा नहीं जा सका। हड़प्पा सभ्यता इसी काल में आती है।
- दुर्ग – नगर का उच्चतर भाग जो ऊँचे चबूतरे पर बना होता था।
- ग्रिड पद्धति – नगर योजना की वह पद्धति जिसमें सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं।
- गोदी – वह स्थान जहाँ जहाज़ रुकते हैं और माल का लदान-उतराई होती है।
12.3 प्रमुख कलाकृतियाँ
- पशुपति मुहर – मोहनजोदड़ो से प्राप्त, त्रिमुख योगी की आकृति।
- नृत्य करती हुई कन्या – काँसे की मूर्ति, मोहनजोदड़ो से प्राप्त।
- विशाल स्नानागार – मोहनजोदड़ो में स्थित।
13. पुरातत्वविदों की विधियाँ
13.1 उत्खनन
पुरातत्वविद उत्खनन (खुदाई) करके पुरानी बस्तियों के अवशेष निकालते हैं। वे मिट्टी की विभिन्न परतों का अध्ययन करके बस्ती की उम्र एवं कालक्रम का पता लगाते हैं।
13.2 वर्गीकरण
मिलने वाली वस्तुओं (मिट्टी के बर्तन, औजार, आभूषण आदि) को वर्गीकृत करके उनके प्रकार, काल एवं उपयोग का पता लगाया जाता है।
13.3 तुलनात्मक अध्ययन
विभिन्न स्थलों से मिली वस्तुओं की तुलना करके व्यापार, संपर्क एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान का पता लगाया जाता है।
13.4 विश्लेषण
- पुरावनस्पति विज्ञान – प्राचीन पौधों एवं बीजों का अध्ययन।
- पुराजीव विज्ञान – प्राचीन जानवरों की हड्डियों का अध्ययन।
- रेडियोकार्बन डेटिंग – कार्बन-14 विधि द्वारा वस्तुओं की उम्र का निर्धारण।
14. निष्कर्ष
अध्याय 1 “ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ (हड़प्पा सभ्यता)” भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह हमें बताता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में सभ्यता की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। इस सभ्यता की नगर योजना, जल निकासी प्रणाली, व्यापार, कला एवं संस्कृति विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं से कम नहीं थी।
हालाँकि इस सभ्यता की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, फिर भी पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर हम इस सभ्यता के जीवन, संस्कृति, अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक संरचना के बारे में काफी कुछ जान पाए हैं।
ईंटें (नगर निर्माण), मनके (कला एवं व्यापार) तथा अस्थियाँ (भोजन एवं जीवनशैली) – ये तीन तत्व हड़प्पा सभ्यता को समझने की कुंजी हैं। इस अध्याय के माध्यम से हम यह समझते हैं कि किस प्रकार पुरातत्वविद इन छोटे-छोटे अवशेषों के आधार पर एक पूरी सभ्यता का पुनर्निर्माण करते हैं।
इस अध्याय का महत्व:
- यह भारत की प्रथम नगरीय सभ्यता को समझाता है।
- यह पुरातात्विक साक्ष्यों के महत्व को स्पष्ट करता है।
- यह बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- यह प्राचीन भारतीय इतिहास की नींव प्रदान करता है।
- यह आगे के अध्यायों को समझने में सहायक है।
इन नोट्स को अपनी परीक्षा की तैयारी के लिए उपयोग करें। सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को अच्छी तरह याद रखें और संभावित प्रश्नों का अभ्यास करें।
