कक्षा 12 भूगोल – अध्याय 6: द्वितीयक क्रियाएँ

द्वितीयक क्रियाएँ वे आर्थिक क्रियाएँ हैं जिनमें प्राथमिक क्रियाओं से प्राप्त कच्चे माल को संसाधित करके तैयार माल में बदला जाता है। इन क्रियाओं को विनिर्माण (Manufacturing) भी कहा जाता है। विनिर्माण वह प्रक्रिया है जिसमें कच्चे माल को मशीनों और श्रम की सहायता से उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित किया जाता है।

द्वितीयक क्रियाओं का मुख्य उद्देश्य कच्चे माल का मूल्य बढ़ाना है। उदाहरण के लिए, कपास से वस्त्र बनाना, लोहे से मशीन बनाना, गन्ने से चीनी बनाना आदि द्वितीयक क्रियाएँ हैं।

इस अध्याय का शीर्षक “द्वितीयक क्रियाएँ” इसलिए रखा गया है क्योंकि यह अध्याय विनिर्माण की प्रक्रिया, उद्योगों के वर्गीकरण, उद्योगों की अवस्थिति के कारकों तथा विश्व के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है।

1. विनिर्माण का अर्थ एवं महत्व

1.1 विनिर्माण क्या है?

विनिर्माण वह प्रक्रिया है जिसमें कच्चे माल को भौतिक और रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा तैयार माल में परिवर्तित किया जाता है। इसमें श्रम, मशीन, ऊर्जा और पूँजी का उपयोग किया जाता है।

1.2 विनिर्माण की विशेषताएँ

  • विनिर्माण में कच्चे माल का रूप बदल जाता है।
  • इसमें मूल्य में वृद्धि होती है।
  • यह एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया जा सकता है।
  • इसमें श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण होता है।
  • इसमें बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है।

1.3 विनिर्माण का महत्व

  • यह रोजगार के अवसर पैदा करता है।
  • यह आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है।
  • यह जीवन स्तर को ऊँचा उठाता है।
  • यह कृषि पर निर्भरता कम करता है।
  • यह विदेशी व्यापार को बढ़ावा देता है।
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2. आधुनिक विनिर्माण की विशेषताएँ

2.1 यांत्रिक शक्ति

आधुनिक विनिर्माण में मानव श्रम के स्थान पर यांत्रिक शक्ति का उपयोग किया जाता है। इससे उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।

2.2 श्रम विभाजन

आधुनिक विनिर्माण में कार्य को विभिन्न भागों में बाँटा जाता है। प्रत्येक श्रमिक एक विशेष कार्य करता है। इससे दक्षता बढ़ती है।

2.3 बड़े पैमाने पर उत्पादन

आधुनिक विनिर्माण में बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन किया जाता है। इससे उत्पादन लागत कम होती है।

2.4 मानकीकरण

आधुनिक विनिर्माण में वस्तुओं का निर्माण एक निश्चित मानक के अनुसार किया जाता है। इससे गुणवत्ता सुनिश्चित होती है।

2.5 अनुसंधान एवं विकास

आधुनिक विनिर्माण में अनुसंधान और विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इससे नए उत्पाद और तकनीक विकसित होती हैं।

2.6 पूँजी की भूमिका

आधुनिक विनिर्माण में बड़ी मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है। यह मशीनों, भवनों और तकनीक में निवेश किया जाता है।

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3. उद्योगों का वर्गीकरण

3.1 कच्चे माल के आधार पर वर्गीकरण

कृषि आधारित उद्योग

ये उद्योग कृषि उत्पादों को कच्चे माल के रूप में उपयोग करते हैं। जैसे – चीनी उद्योग, कपड़ा उद्योग, तेल उद्योग, चाय उद्योग, कॉफी उद्योग।

खनिज आधारित उद्योग

ये उद्योग खनिजों को कच्चे माल के रूप में उपयोग करते हैं। जैसे – लोहा और इस्पात उद्योग, एल्युमिनियम उद्योग, सीमेंट उद्योग, रसायन उद्योग।

वन आधारित उद्योग

ये उद्योग वनों से प्राप्त कच्चे माल का उपयोग करते हैं। जैसे – कागज उद्योग, फर्नीचर उद्योग, रेयॉन उद्योग।

पशु आधारित उद्योग

ये उद्योग पशुओं से प्राप्त कच्चे माल का उपयोग करते हैं। जैसे – चमड़ा उद्योग, ऊन उद्योग, डेयरी उद्योग।

समुद्री आधारित उद्योग

ये उद्योग समुद्र से प्राप्त कच्चे माल का उपयोग करते हैं। जैसे – मछली प्रसंस्करण उद्योग, नमक उद्योग।

3.2 आकार के आधार पर वर्गीकरण

  • कुटीर उद्योग (Cottage Industry) – ये घरों में चलाए जाते हैं। इनमें परिवार के सदस्य काम करते हैं। जैसे – हस्तशिल्प, बुनाई।
  • लघु उद्योग (Small Scale Industry) – इनमें कम पूँजी और कम श्रमिकों की आवश्यकता होती है।
  • मध्यम उद्योग (Medium Scale Industry) – इनमें मध्यम स्तर की पूँजी और श्रमिक होते हैं।
  • बड़े उद्योग (Large Scale Industry) – इनमें बड़ी पूँजी, आधुनिक तकनीक और बड़ी संख्या में श्रमिक होते हैं। जैसे – लोहा-इस्पात उद्योग।

3.3 स्वामित्व के आधार पर वर्गीकरण

  • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग – सरकार के स्वामित्व वाले।
  • निजी क्षेत्र के उद्योग – निजी व्यक्तियों के स्वामित्व वाले।
  • संयुक्त क्षेत्र के उद्योग – सरकार और निजी दोनों के स्वामित्व वाले।
  • सहकारी क्षेत्र के उद्योग – सहकारी समितियों के स्वामित्व वाले।

3.4 उत्पादों के आधार पर वर्गीकरण

  • भारी उद्योग – लोहा, इस्पात, मशीनरी, सीमेंट।
  • हल्के उद्योग – कपड़ा, चीनी, कागज, इलेक्ट्रॉनिक्स।
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4. उद्योगों की अवस्थिति के कारक

4.1 कच्चे माल की उपलब्धता

उद्योगों की स्थापना उन स्थानों पर की जाती है जहाँ कच्चा माल आसानी से उपलब्ध हो। जैसे – लोहा-इस्पात उद्योग लोहा अयस्क क्षेत्रों के पास स्थापित किए जाते हैं।

4.2 ऊर्जा की उपलब्धता

उद्योगों को चलाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। कोयला, बिजली, पेट्रोलियम आदि ऊर्जा के स्रोत हैं।

4.3 बाजार की निकटता

उद्योगों की स्थापना बाजार के पास की जाती है ताकि तैयार माल को आसानी से बेचा जा सके।

4.4 परिवहन की सुविधा

अच्छे परिवहन साधनों वाले स्थानों पर उद्योग स्थापित किए जाते हैं। सड़क, रेल, जल और वायु मार्ग महत्वपूर्ण हैं।

4.5 श्रम की उपलब्धता

उद्योगों को कुशल और अकुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है। घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों में श्रमिक आसानी से उपलब्ध होते हैं।

4.6 पूँजी की उपलब्धता

उद्योगों की स्थापना के लिए बड़ी मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है। बैंक, वित्तीय संस्थान पूँजी उपलब्ध कराते हैं।

4.7 सरकारी नीतियाँ

सरकार की नीतियाँ उद्योगों की स्थापना को प्रभावित करती हैं। कर छूट, सब्सिडी आदि उद्योगों को आकर्षित करती हैं।

4.8 जल की उपलब्धता

कई उद्योगों को जल की आवश्यकता होती है। जैसे – कागज उद्योग, कपड़ा उद्योग।

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5. उद्योगों के प्रकार – विस्तृत

5.1 कुटीर उद्योग

कुटीर उद्योग वे उद्योग हैं जो घरों में चलाए जाते हैं। इनमें परिवार के सदस्य काम करते हैं। इनमें पारंपरिक तकनीक का उपयोग किया जाता है। जैसे – हस्तशिल्प, बुनाई, मिट्टी के बर्तन बनाना।

5.2 लघु उद्योग

लघु उद्योग वे उद्योग हैं जिनमें कम पूँजी और कम श्रमिकों की आवश्यकता होती है। इनमें मशीनों का सीमित उपयोग होता है।

5.3 बड़े उद्योग

बड़े उद्योग वे उद्योग हैं जिनमें बड़ी पूँजी, आधुनिक तकनीक और बड़ी संख्या में श्रमिकों की आवश्यकता होती है। जैसे – लोहा-इस्पात उद्योग, पेट्रोरसायन उद्योग।

5.4 आधारभूत उद्योग

आधारभूत उद्योग वे उद्योग हैं जिनके उत्पादों का उपयोग अन्य उद्योगों में कच्चे माल के रूप में किया जाता है। जैसे – लोहा-इस्पात उद्योग।

5.5 उपभोक्ता वस्तु उद्योग

उपभोक्ता वस्तु उद्योग वे उद्योग हैं जो सीधे उपभोक्ताओं के लिए वस्तुएँ बनाते हैं। जैसे – कपड़ा उद्योग, चीनी उद्योग।

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6. फुटलूज उद्योग (Footloose Industries)

6.1 फुटलूज उद्योग का अर्थ

फुटलूज उद्योग वे उद्योग हैं जिन्हें किसी विशेष स्थान पर स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होती। ये उद्योग कहीं भी स्थापित किए जा सकते हैं।

6.2 विशेषताएँ

  • इनमें कच्चे माल का भार कम होता है।
  • इनके उत्पादों का मूल्य अधिक होता है।
  • ये कहीं भी स्थापित किए जा सकते हैं।
  • इनमें कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होती है।

6.3 उदाहरण

  • इलेक्ट्रॉनिक उद्योग
  • घड़ी निर्माण उद्योग
  • आभूषण उद्योग
  • कैमरा निर्माण उद्योग
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7. औद्योगिक प्रणालियाँ

7.1 फोर्डवाद (Fordism)

फोर्डवाद एक औद्योगिक उत्पादन प्रणाली है जिसे हेनरी फोर्ड ने विकसित किया। इस प्रणाली में बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। इसमें श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण होता है।

7.2 फोर्डवाद की विशेषताएँ

  • बड़े पैमाने पर उत्पादन
  • श्रम विभाजन और विशिष्टीकरण
  • असेम्बली लाइन उत्पादन
  • मानकीकृत उत्पाद
  • उच्च मजदूरी

7.3 उत्तर-फोर्डवाद (Post-Fordism)

उत्तर-फोर्डवाद वह औद्योगिक प्रणाली है जो फोर्डवाद के बाद विकसित हुई। इसमें लचीले उत्पादन पर जोर दिया जाता है।

7.4 उत्तर-फोर्डवाद की विशेषताएँ

  • लचीला उत्पादन
  • विविध उत्पाद
  • स्वचालित मशीनें
  • कुशल श्रमिक
  • वैश्विक उत्पादन नेटवर्क
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8. विश्व के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश

8.1 पूर्वी उत्तरी अमेरिका

यह विश्व का सबसे बड़ा औद्योगिक प्रदेश है। यह अमेरिका के पूर्वी भाग में स्थित है। यहाँ लोहा-इस्पात, ऑटोमोबाइल, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि उद्योग हैं।

8.2 पश्चिमी यूरोप

यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा औद्योगिक प्रदेश है। यह ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, बेल्जियम आदि देशों में फैला है।

8.3 मध्य एवं पूर्वी यूरोप

यह पोलैंड, चेक गणराज्य, हंगरी, रूस आदि देशों में फैला है।

8.4 पूर्वी एशिया

यह चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान आदि देशों में फैला है। यह तेजी से विकसित हो रहा औद्योगिक प्रदेश है।

8.5 दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया

यह भारत, मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि देशों में फैला है।

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9. महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

  • द्वितीयक क्रियाएँ – वे आर्थिक क्रियाएँ जिनमें कच्चे माल को तैयार माल में बदला जाता है
  • विनिर्माण – कच्चे माल को मशीनों और श्रम की सहायता से उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित करना
  • कुटीर उद्योग – घरों में चलाए जाने वाले उद्योग
  • लघु उद्योग – कम पूँजी और कम श्रमिकों वाले उद्योग
  • बड़े उद्योग – बड़ी पूँजी और आधुनिक तकनीक वाले उद्योग
  • फुटलूज उद्योग – वे उद्योग जिन्हें किसी विशेष स्थान पर स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होती
  • फोर्डवाद – बड़े पैमाने पर उत्पादन की औद्योगिक प्रणाली
  • उत्तर-फोर्डवाद – लचीले उत्पादन की औद्योगिक प्रणाली
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10. महत्वपूर्ण तथ्य

  • द्वितीयक क्रियाओं को विनिर्माण भी कहा जाता है।
  • विनिर्माण में कच्चे माल का मूल्य बढ़ जाता है।
  • आधुनिक विनिर्माण की मुख्य विशेषता यांत्रिक शक्ति है।
  • कुटीर उद्योग घरों में चलाए जाते हैं।
  • फुटलूज उद्योग कहीं भी स्थापित किए जा सकते हैं।
  • हेनरी फोर्ड ने फोर्डवाद प्रणाली विकसित की।
  • पूर्वी उत्तरी अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा औद्योगिक प्रदेश है।
  • पश्चिमी यूरोप विश्व का दूसरा सबसे बड़ा औद्योगिक प्रदेश है।
  • लोहा-इस्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग है।
  • कपड़ा उद्योग एक उपभोक्ता वस्तु उद्योग है।
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11. निष्कर्ष

अध्याय 6 “द्वितीयक क्रियाएँ” विनिर्माण की प्रक्रिया, उद्योगों के वर्गीकरण, उद्योगों की अवस्थिति के कारकों तथा विश्व के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह अध्याय हमें सिखाता है:

  • द्वितीयक क्रियाएँ – ये कच्चे माल को तैयार माल में बदलती हैं।
  • आधुनिक विनिर्माण की विशेषताएँ – यांत्रिक शक्ति, श्रम विभाजन, बड़े पैमाने पर उत्पादन।
  • उद्योगों का वर्गीकरण – कच्चे माल, आकार, स्वामित्व और उत्पादों के आधार पर।
  • उद्योगों की अवस्थिति के कारक – कच्चा माल, ऊर्जा, बाजार, परिवहन, श्रम, पूँजी।
  • औद्योगिक प्रणालियाँ – फोर्डवाद और उत्तर-फोर्डवाद।
  • विश्व के प्रमुख औद्योगिक प्रदेश – पूर्वी उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, पूर्वी एशिया।

इस अध्याय का महत्व:

  • यह आर्थिक भूगोल की मूल अवधारणाओं को समझाता है।
  • यह उद्योगों के वर्गीकरण और अवस्थिति के कारकों को स्पष्ट करता है।
  • यह बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • यह विश्व के प्रमुख औद्योगिक प्रदेशों को समझने में सहायक है।
  • यह भूगोल के अन्य अध्यायों को समझने की नींव प्रदान करता है।

इन नोट्स को अपनी परीक्षा की तैयारी के लिए उपयोग करें। सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को अच्छी तरह याद रखें और संभावित प्रश्नों का अभ्यास करें।

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