कक्षा 12 भूगोल – अध्याय 9: भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास
नियोजन का तात्पर्य भविष्य के लिए पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रक्रिया से है। किसी भी देश के विकास के लिए नियोजन अत्यंत आवश्यक है। भारत में स्वतंत्रता के बाद से ही नियोजन की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। सततपोषणीय विकास का तात्पर्य ऐसे विकास से है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता को भी बनाए रखे।
आज विश्व के सामने पर्यावरणीय समस्याएँ, संसाधनों की कमी, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियाँ हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए सततपोषणीय विकास आवश्यक है। भारत में नियोजन और सततपोषणीय विकास दोनों का महत्व लगातार बढ़ता जा रहा है।
इस अध्याय का शीर्षक “भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास” इसलिए रखा गया है क्योंकि यह अध्याय भारत में नियोजन की प्रक्रिया, पंचवर्षीय योजनाओं, सततपोषणीय विकास की अवधारणा तथा पर्यावरणीय समस्याओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है।
1. नियोजन का अर्थ एवं महत्व
1.1 नियोजन क्या है?
नियोजन वह प्रक्रिया है जिसमें भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं और उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए साधनों और संसाधनों का व्यवस्थित उपयोग किया जाता है। नियोजन में समय, धन, श्रम और संसाधनों का समुचित उपयोग किया जाता है।
1.2 नियोजन की विशेषताएँ
- नियोजन में लक्ष्यों का निर्धारण किया जाता है।
- यह एक सतत प्रक्रिया है।
- यह भविष्य के लिए किया जाता है।
- इसमें संसाधनों का इष्टतम उपयोग किया जाता है।
- यह लचीला होता है।
- इसमें जनता की भागीदारी आवश्यक होती है।
1.3 नियोजन का महत्व
- यह आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है।
- यह सामाजिक न्याय सुनिश्चित करता है।
- यह संसाधनों का समुचित उपयोग सुनिश्चित करता है।
- यह क्षेत्रीय असंतुलन को कम करता है।
- यह गरीबी और बेरोजगारी को कम करने में सहायक है।
- यह आधारभूत संरचना के विकास में सहायक है।
2. भारत में नियोजन की पृष्ठभूमि
2.1 स्वतंत्रता से पहले के प्रयास
भारत में नियोजन की शुरुआत स्वतंत्रता से पहले ही हो गई थी। इसके प्रमुख प्रयास निम्नलिखित हैं:
विश्वेश्वरैया योजना (1934)
सर एम. विश्वेश्वरैया ने 1934 में एक दस वर्षीय योजना प्रस्तुत की। इस योजना में औद्योगिकीकरण पर जोर दिया गया। इसमें कृषि, उद्योग, परिवहन और शिक्षा के विकास का प्रस्ताव था।
राष्ट्रीय नियोजन समिति (1938)
कांग्रेस द्वारा गठित राष्ट्रीय नियोजन समिति ने 1938 में एक व्यापक योजना प्रस्तुत की। इसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू थे। इस योजना में आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय पर जोर दिया गया।
बॉम्बे प्लान (1944)
आठ उद्योगपतियों ने मिलकर बॉम्बे प्लान प्रस्तुत किया। इस योजना में सार्वजनिक क्षेत्र के विकास पर जोर दिया गया।
2.2 स्वतंत्रता के बाद की योजनाएँ
स्वतंत्रता के बाद 1950 में योजना आयोग की स्थापना की गई। 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना शुरू की गई।
3. भारत में योजना आयोग
3.1 योजना आयोग की स्थापना
योजना आयोग की स्थापना 15 मार्च 1950 को की गई। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते थे। जवाहरलाल नेहरू इसके पहले अध्यक्ष थे।
3.2 योजना आयोग के कार्य
- देश के संसाधनों का आकलन करना।
- पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण करना।
- योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना।
- योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करना।
- राज्यों को सहायता प्रदान करना।
3.3 नीति आयोग (NITI Aayog)
2015 में योजना आयोग का स्थान नीति आयोग (National Institution for Transforming India) ने ले लिया। नीति आयोग एक थिंक टैंक के रूप में कार्य करता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है।
नीति आयोग के उद्देश्य
- सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना।
- राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
- दीर्घकालिक नीतियों का निर्माण करना।
- तकनीकी सलाह प्रदान करना।
- नवाचार को बढ़ावा देना।
4. पंचवर्षीय योजनाएँ
4.1 प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56)
- इसका मुख्य लक्ष्य कृषि का विकास था।
- इसमें सिंचाई और बिजली परियोजनाओं पर जोर दिया गया।
- यह योजना सफल रही।
4.2 द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61)
- इसका मुख्य लक्ष्य औद्योगिकीकरण था।
- इसमें भारी उद्योगों पर जोर दिया गया।
- भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर इस्पात संयंत्र स्थापित किए गए।
4.3 तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-66)
- इसका लक्ष्य आत्मनिर्भरता था।
- चीन और पाकिस्तान से युद्ध के कारण यह योजना असफल रही।
4.4 योजना अवकाश (1966-69)
युद्ध और अकाल के कारण तीन वर्ष तक कोई पंचवर्षीय योजना नहीं बनाई गई। इस अवधि को योजना अवकाश कहा जाता है।
4.5 चतुर्थ पंचवर्षीय योजना (1969-74)
- इसका लक्ष्य स्थिरता और आत्मनिर्भरता था।
- इसमें गरीबी हटाओ और रोजगार पर जोर दिया गया।
4.6 पंचम पंचवर्षीय योजना (1974-79)
- इसका लक्ष्य गरीबी उन्मूलन और आत्मनिर्भरता था।
- इसमें न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम शुरू किया गया।
4.7 षष्ठम पंचवर्षीय योजना (1980-85)
- इसका लक्ष्य आर्थिक उदारीकरण था।
- इसमें गरीबी उन्मूलन और रोजगार पर जोर दिया गया।
4.8 सप्तम पंचवर्षीय योजना (1985-90)
- इसका लक्ष्य खाद्य उत्पादन, रोजगार और उत्पादकता था।
- इसमें आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया।
4.9 अष्टम पंचवर्षीय योजना (1992-97)
- इसका लक्ष्य मानव संसाधन विकास था।
- इसमें जनसंख्या नियंत्रण पर जोर दिया गया।
4.10 नवम पंचवर्षीय योजना (1997-2002)
- इसका लक्ष्य सामाजिक न्याय और समानता था।
- इसमें ग्रामीण विकास पर जोर दिया गया।
4.11 दशम पंचवर्षीय योजना (2002-07)
- इसका लक्ष्य 2007 तक गरीबी को 5% कम करना था।
- इसमें सामाजिक क्षेत्रों पर जोर दिया गया।
4.12 एकादश पंचवर्षीय योजना (2007-12)
- इसका लक्ष्य तीव्र और अधिक समावेशी विकास था।
- इसमें शिक्षा और स्वास्थ्य पर जोर दिया गया।
4.13 द्वादश पंचवर्षीय योजना (2012-17)
- यह अंतिम पंचवर्षीय योजना थी।
- इसका लक्ष्य तीव्र, सतत और अधिक समावेशी विकास था।
- इसमें सततपोषणीय विकास पर जोर दिया गया।
5. सततपोषणीय विकास (Sustainable Development)
5.1 सततपोषणीय विकास का अर्थ
सततपोषणीय विकास का तात्पर्य ऐसे विकास से है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता को भी बनाए रखे। यह विकास का वह मॉडल है जिसमें आर्थिक विकास, सामाजिक विकास और पर्यावरण संरक्षण तीनों को समान महत्व दिया जाता है।
5.2 सततपोषणीय विकास की परिभाषा
ब्रुंटलैंड आयोग (1987) के अनुसार, “सततपोषणीय विकास वह विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, बिना भावी पीढ़ियों की अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए।”
5.3 सततपोषणीय विकास के सिद्धांत
संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग
संसाधनों का उपयोग इस प्रकार होना चाहिए कि वे भावी पीढ़ियों के लिए भी उपलब्ध रहें।
पर्यावरण संरक्षण
विकास की प्रक्रिया में पर्यावरण का संरक्षण आवश्यक है।
सामाजिक समानता
विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचना चाहिए।
जैव विविधता का संरक्षण
जैव विविधता का संरक्षण सततपोषणीय विकास का महत्वपूर्ण अंग है।
जनसंख्या नियंत्रण
जनसंख्या नियंत्रण सततपोषणीय विकास के लिए आवश्यक है।
5.4 सततपोषणीय विकास के लक्ष्य
- गरीबी उन्मूलन
- भुखमरी की समाप्ति
- स्वास्थ्य और कल्याण
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
- लैंगिक समानता
- स्वच्छ जल और स्वच्छता
- सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा
- सम्मानजनक कार्य और आर्थिक विकास
- उद्योग, नवाचार और अवसंरचना
- असमानता में कमी
- सतत शहर और समुदाय
- जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन
- जलवायु कार्रवाई
- जल के नीचे जीवन
- भूमि पर जीवन
- शांति, न्याय और मजबूत संस्थाएँ
- लक्ष्यों के लिए साझेदारी
6. पर्यावरणीय समस्याएँ
6.1 वायु प्रदूषण
- वायु प्रदूषण भारत की प्रमुख पर्यावरणीय समस्या है।
- यह उद्योगों, वाहनों, निर्माण कार्यों और घरेलू ईंधन से होता है।
- वायु प्रदूषण से श्वसन रोग, हृदय रोग आदि होते हैं।
- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता आदि शहरों में वायु प्रदूषण अधिक है।
6.2 जल प्रदूषण
- जल प्रदूषण नदियों, झीलों और भूमिगत जल में होता है।
- यह औद्योगिक कचरे, सीवेज, कृषि रसायनों से होता है।
- गंगा, यमुना आदि नदियाँ प्रदूषित हो चुकी हैं।
- जल प्रदूषण से जलजनित रोग फैलते हैं।
6.3 भूमि क्षरण
- भूमि क्षरण से भूमि की उत्पादकता कम होती है।
- यह वनों की कटाई, अति चराई, अति सिंचाई से होता है।
- भूमि क्षरण से मरुस्थलीकरण होता है।
6.4 वनों की कटाई
- वनों की कटाई से जैव विविधता कम होती है।
- यह जलवायु परिवर्तन का कारण बनती है।
- यह मिट्टी के कटाव को बढ़ाती है।
6.5 जलवायु परिवर्तन
- जलवायु परिवर्तन वैश्विक समस्या है।
- यह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से होता है।
- इससे तापमान में वृद्धि, समुद्र स्तर में वृद्धि, अनियमित वर्षा आदि होती है।
7. सततपोषणीय विकास के उपाय
7.1 नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग
सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत आदि नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग बढ़ाना चाहिए।
7.2 ऊर्जा दक्षता
ऊर्जा दक्ष उपकरणों का उपयोग करके ऊर्जा की बचत की जा सकती है।
7.3 जल संरक्षण
वर्षा जल संग्रहण, जल का पुनःचक्रण आदि से जल संरक्षण किया जा सकता है।
7.4 वृक्षारोपण
अधिक से अधिक पेड़ लगाकर पर्यावरण संरक्षण किया जा सकता है।
7.5 जैविक खेती
रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के स्थान पर जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए।
7.6 जनसंख्या नियंत्रण
जनसंख्या नियंत्रण से संसाधनों पर दबाव कम होता है।
7.7 जन जागरूकता
पर्यावरण संरक्षण के लिए जन जागरूकता आवश्यक है।
7.8 सतत शहरीकरण
शहरों का विकास सतत तरीके से होना चाहिए।
8. भारत में सततपोषणीय विकास की चुनौतियाँ
- जनसंख्या वृद्धि – बढ़ती जनसंख्या संसाधनों पर दबाव डालती है।
- गरीबी – गरीबी के कारण लोग पर्यावरण की परवाह नहीं करते।
- अशिक्षा – अशिक्षा के कारण लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक नहीं हैं।
- औद्योगीकरण – तेज औद्योगीकरण से प्रदूषण बढ़ता है।
- शहरीकरण – अनियोजित शहरीकरण समस्याएँ पैदा करता है।
- ऊर्जा की माँग – बढ़ती ऊर्जा की माँग से संसाधनों का अत्यधिक उपयोग।
- वनों की कटाई – वनों की कटाई से पारिस्थितिकी असंतुलन।
- जलवायु परिवर्तन – यह एक वैश्विक चुनौती है।
9. सरकारी प्रयास एवं नीतियाँ
9.1 पर्यावरण संरक्षण अधिनियम
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972)
- जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम (1974)
- वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम (1981)
- पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986)
9.2 प्रमुख अभियान
- स्वच्छ भारत अभियान – स्वच्छता के लिए।
- नमामि गंगे – गंगा नदी की सफाई के लिए।
- राष्ट्रीय सौर मिशन – सौर ऊर्जा को बढ़ावा।
- ग्रीन इंडिया मिशन – वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए।
- जल जीवन मिशन – हर घर नल से जल।
9.3 अंतर्राष्ट्रीय प्रयास
- स्टॉकहोम सम्मेलन (1972)
- रियो सम्मेलन (1992)
- क्योटो प्रोटोकॉल (1997)
- पेरिस समझौता (2015)
- सतत विकास लक्ष्य (SDGs)
10. महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
- नियोजन – भविष्य के लिए पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रक्रिया
- सततपोषणीय विकास – ऐसा विकास जो वर्तमान और भावी पीढ़ियों दोनों की आवश्यकताओं की पूर्ति करे
- पंचवर्षीय योजना – पाँच वर्ष की अवधि के लिए बनाई गई योजना
- योजना आयोग – देश की योजनाओं का निर्माण करने वाली संस्था
- नीति आयोग – योजना आयोग का स्थान लेने वाली संस्था
- जलवायु परिवर्तन – पृथ्वी के जलवायु में दीर्घकालिक परिवर्तन
- जैव विविधता – पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवों की विविधता
- मरुस्थलीकरण – उपजाऊ भूमि का मरुस्थल में बदलना
11. महत्वपूर्ण तथ्य
- योजना आयोग की स्थापना 15 मार्च 1950 को हुई।
- प्रथम पंचवर्षीय योजना 1951 में शुरू हुई।
- प्रथम योजना का लक्ष्य कृषि का विकास था।
- द्वितीय योजना का लक्ष्य औद्योगिकीकरण था।
- 1966-69 की अवधि को योजना अवकाश कहा जाता है।
- 2015 में योजना आयोग का स्थान नीति आयोग ने लिया।
- द्वादश पंचवर्षीय योजना (2012-17) अंतिम पंचवर्षीय योजना थी।
- ब्रुंटलैंड आयोग 1987 में सततपोषणीय विकास की अवधारणा दी।
- स्टॉकहोम सम्मेलन 1972 में हुआ।
- पेरिस समझौता 2015 में हुआ।
- भारत में 17 सतत विकास लक्ष्य (SDGs) हैं।
- स्वच्छ भारत अभियान 2014 में शुरू हुआ।
12. निष्कर्ष
अध्याय 9 “भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास” भारत में नियोजन की प्रक्रिया, पंचवर्षीय योजनाओं, सततपोषणीय विकास की अवधारणा तथा पर्यावरणीय समस्याओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह अध्याय हमें सिखाता है:
- नियोजन का अर्थ – यह भविष्य के लिए पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रक्रिया है।
- भारत में नियोजन – स्वतंत्रता से पहले ही नियोजन के प्रयास शुरू हो गए थे।
- पंचवर्षीय योजनाएँ – 1951 से 2017 तक 12 पंचवर्षीय योजनाएँ बनाई गईं।
- सततपोषणीय विकास – यह वर्तमान और भावी पीढ़ियों दोनों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
- पर्यावरणीय समस्याएँ – वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि क्षरण, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन।
- सततपोषणीय विकास के उपाय – नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, वृक्षारोपण।
- सरकारी प्रयास – पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, स्वच्छ भारत अभियान, नमामि गंगे।
इस अध्याय का महत्व:
- यह नियोजन की मूल अवधारणाओं को समझाता है।
- यह भारत में नियोजन की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है।
- यह बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- यह सततपोषणीय विकास और पर्यावरण संरक्षण की अवधारणाओं को समझने में सहायक है।
- यह भूगोल के अन्य अध्यायों को समझने की नींव प्रदान करता है।
इन नोट्स को अपनी परीक्षा की तैयारी के लिए उपयोग करें। सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को अच्छी तरह याद रखें और संभावित प्रश्नों का अभ्यास करें।
