बिहार बोर्ड — कक्षा 12 : राजनीति विज्ञान
अध्याय 8 : क्षेत्रीय आकांक्षाएँ
KK MAHTO — Founder & Educator, Apni Kaksha
📑 विषय-सूची (Contents)
- परिचय एवं क्षेत्रीय आकांक्षा की अवधारणा
- क्षेत्रवाद के कारण एवं स्वरूप
- जम्मू-कश्मीर की समस्या
- पंजाब की समस्या एवं खालिस्तान आंदोलन
- उत्तर-पूर्वी राज्यों की समस्या
- असम आंदोलन एवं बोडो समस्या
- नागालैंड एवं मिजोरम की समस्या
- सिक्किम का भारत में विलय
- तमिलनाडु एवं द्रविड़ आंदोलन
- भाषा एवं क्षेत्रीय अस्मिता
- “सons of the Soil” (भूमि पुत्र) की अवधारणा
- झारखंड, उत्तराखंड एवं छत्तीसगढ़ का गठन
- क्षेत्रीय दलों की भूमिका
- केंद्र-राज्य संबंध एवं सहकारी संघवाद
- क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान
- महत्वपूर्ण तिथियाँ एवं तथ्य
- महत्वपूर्ण प्रश्न (परीक्षा के लिए)
1. परिचय एवं क्षेत्रीय आकांक्षा की अवधारणा
भारत एक विशाल एवं विविधतापूर्ण देश है। यहाँ अनेक भाषाएँ, धर्म, जातियाँ, संस्कृतियाँ एवं क्षेत्र हैं। इस विविधता के कारण ही भारत को “विविधता में एकता” का देश कहा जाता है। परंतु यह विविधता कभी-कभी क्षेत्रीय आकांक्षाओं एवं अस्मिता के रूप में भी प्रकट होती है।
स्वतंत्रता के बाद कई क्षेत्रों में यह भावना उभरी कि उनके क्षेत्र की उपेक्षा हो रही है, उनकी भाषा, संस्कृति एवं पहचान को खतरा है। इन भावनाओं ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को जन्म दिया। कुछ क्षेत्रों में ये आकांक्षाएँ अलग राज्य की माँग तक पहुँचीं, तो कुछ में स्वायत्तता की माँग उठी।
📖 परिभाषा — क्षेत्रीय आकांक्षा (Regional Aspiration)
क्षेत्रीय आकांक्षा से तात्पर्य किसी विशेष क्षेत्र के लोगों की उस भावना से है, जिसमें वे अपने क्षेत्र की पहचान, भाषा, संस्कृति, संसाधनों एवं विकास के प्रति सजग होते हैं और अपने क्षेत्रीय हितों की रक्षा एवं प्राप्ति के लिए संगठित होते हैं। यह आकांक्षा राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप की हो सकती है।
📖 परिभाषा — क्षेत्रवाद (Regionalism)
क्षेत्रवाद वह राजनीतिक एवं सामाजिक प्रवृत्ति है, जिसमें किसी विशेष क्षेत्र के लोग अपनी क्षेत्रीय पहचान, हितों एवं आकांक्षाओं को राष्ट्रीय हितों से ऊपर या उनके समानांतर रखते हैं। क्षेत्रवाद सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी।
क्षेत्रीय आकांक्षाओं के प्रकार
- अलग राज्य की माँग — जैसे झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना।
- अलग देश की माँग — जैसे खालिस्तान, कश्मीर की स्वतंत्रता।
- स्वायत्तता की माँग — जैसे नागालैंड, मिजोरम, जम्मू-कश्मीर।
- भाषा एवं संस्कृति की रक्षा — जैसे तमिलनाडु, पंजाब।
- संसाधनों पर अधिकार — जैसे आदिवासी क्षेत्र, पूर्वोत्तर।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व — केंद्र में अधिक भागीदारी।
📌 महत्वपूर्ण तथ्य
भारतीय संविधान में राज्यों के पुनर्गठन की व्यवस्था है। भाषा के आधार पर राज्यों का गठन किया गया, जिससे अनेक क्षेत्रीय आकांक्षाओं को शांत किया गया। परंतु कुछ आकांक्षाएँ अभी भी शेष हैं।
2. क्षेत्रवाद के कारण एवं स्वरूप
क्षेत्रवाद के कारण
- भाषाई विविधता — भारत में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। भाषा की पहचान क्षेत्रवाद का प्रमुख कारण बनी।
- सांस्कृतिक विविधता — प्रत्येक क्षेत्र की अपनी संस्कृति, परंपरा एवं रीति-रिवाज हैं।
- आर्थिक असमानता — कुछ क्षेत्रों का विकास तेज हुआ, तो कुछ पिछड़े रह गए।
- संसाधनों का असमान वितरण — कुछ क्षेत्रों के संसाधनों का उपयोग अन्य क्षेत्रों के लिए किया गया।
- राजनीतिक उपेक्षा — कुछ क्षेत्रों को राजनीतिक निर्णयों में भागीदारी नहीं मिली।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — कुछ क्षेत्रों का स्वतंत्र अस्तित्व रहा था।
- भौगोलिक अलगाव — पहाड़ी एवं दूर-दराज क्षेत्रों का अलगाव।
- प्रशासनिक कारण — बड़े राज्यों में प्रशासनिक कठिनाई।
- जनजागरूकता — शिक्षा एवं मीडिया के कारण जागरूकता बढ़ी।
- राजनीतिक दलों का स्वार्थ — कुछ दलों ने क्षेत्रवाद को बढ़ावा दिया।
क्षेत्रवाद के स्वरूप
| स्वरूप | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| सकारात्मक क्षेत्रवाद | क्षेत्रीय विकास एवं पहचान की रक्षा | झारखंड आंदोलन |
| नकारात्मक क्षेत्रवाद | अलगाववाद एवं हिंसा | खालिस्तान आंदोलन |
| भाषाई क्षेत्रवाद | भाषा के आधार पर राज्य | आंध्र प्रदेश (1953) |
| सांस्कृतिक क्षेत्रवाद | संस्कृति एवं परंपरा की रक्षा | तमिलनाडु |
| आर्थिक क्षेत्रवाद | संसाधनों पर अधिकार | नर्मदा आंदोलन |
| राजनीतिक क्षेत्रवाद | राजनीतिक स्वायत्तता | कश्मीर, नागालैंड |
💡 उदाहरण
1953 में भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश का गठन हुआ। इसके बाद 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग (फजल अली आयोग) की सिफारिशों पर भाषा के आधार पर अनेक राज्यों का गठन किया गया। इससे अनेक भाषाई आकांक्षाओं को शांत किया गया।
3. जम्मू-कश्मीर की समस्या
पृष्ठभूमि
- 1947 में भारत के विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी।
- महाराजा हरि सिंह ने विलय का निर्णय टाल दिया।
- पाकिस्तान ने कबाइलियों के माध्यम से कश्मीर पर हमला किया।
- महाराजा ने भारत से सहायता मांगी और विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
- भारतीय सेना ने पाकिस्तानी कबाइलियों को खदेड़ा।
- 1948 में संयुक्त राष्ट्र में मामला गया और युद्ध विराम हुआ।
- इसके बाद LOC (नियंत्रण रेखा) का निर्माण हुआ।
अनुच्छेद 370 एवं विशेष दर्जा
📖 परिभाषा — अनुच्छेद 370
अनुच्छेद 370 संविधान का वह प्रावधान था, जो जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देता था। इसके अनुसार, संसद के कानून जम्मू-कश्मीर पर लागू करने के लिए राज्य विधानसभा की सहमति आवश्यक थी। जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान, ध्वज एवं स्वायत्तता थी।
जम्मू-कश्मीर की समस्या के कारण
- पाकिस्तान का दावा एवं हस्तक्षेप।
- अनुच्छेद 370 के कारण स्वायत्तता।
- राजनीतिक अस्थिरता।
- आतंकवाद एवं उग्रवाद।
- धार्मिक एवं सांप्रदायिक तनाव।
- विकास की कमी।
- पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद।
- क्षेत्रीय अस्मिता की भावना।
महत्वपूर्ण घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1947 | कश्मीर का भारत में विलय |
| 1948 | संयुक्त राष्ट्र में मामला; युद्ध विराम |
| 1952 | दिल्ली समझौता (नेहरू-शेख अब्दुल्ला) |
| 1957 | जम्मू-कश्मीर का संविधान लागू |
| 1965 | भारत-पाक युद्ध |
| 1972 | शिमला समझौता (LOC को मान्यता) |
| 1989 | कश्मीर में उग्रवाद शुरू |
| 2019 | अनुच्छेद 370 की समाप्ति |
📌 महत्वपूर्ण तथ्य
5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को समाप्त कर दिया और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख — में विभाजित कर दिया। यह भारतीय राजनीति का एक ऐतिहासिक निर्णय था।
4. पंजाब की समस्या एवं खालिस्तान आंदोलन
पृष्ठभूमि
- 1947 में पंजाब का विभाजन हुआ — पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान में चला गया।
- 1966 में भाषा के आधार पर पंजाब का पुनर्गठन हुआ।
- पंजाब में हिंदी भाषी क्षेत्र हरियाणा को दे दिए गए।
- चंडीगढ़ को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
- कुछ सिख नेताओं ने इसे अन्याय माना।
- आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973) में अधिक स्वायत्तता की माँग की गई।
- इसके बाद पंजाब में अलगाववादी आंदोलन शुरू हुआ।
खालिस्तान आंदोलन
📖 परिभाषा — खालिस्तान आंदोलन
खालिस्तान आंदोलन पंजाब में सिख अलगाववादियों द्वारा चलाया गया आंदोलन था, जिसका उद्देश्य पंजाब में एक अलग सिख राष्ट्र “खालिस्तान” की स्थापना करना था। यह आंदोलन 1980 के दशक में चरम पर था।
आंदोलन के कारण
- आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की माँगें पूरी नहीं हुईं।
- चंडीगढ़ एवं कुछ क्षेत्रों का पंजाब को न मिलना।
- जल संसाधनों (नदियों) का बँटवारा।
- कृषि संकट एवं बेरोजगारी।
- धार्मिक भावनाओं का राजनीतिकरण।
- बाहरी शक्तियों का समर्थन (पाकिस्तान)।
- सिख धार्मिक नेताओं का उभार।
महत्वपूर्ण घटनाएँ
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1973 | आनंदपुर साहिब प्रस्ताव |
| 1981 | जरनैल सिंह भिंडरावाले का उभार |
| 1984 | ऑपरेशन ब्लू स्टार (स्वर्ण मंदिर पर सैन्य कार्रवाई) |
| 1984 | इंदिरा गांधी की हत्या |
| 1984 | सिख विरोधी दंगे |
| 1985 | राजीव-लोंगोवाल समझौता |
| 1990 | पंजाब में उग्रवाद चरम पर |
| 1990 के दशक | पंजाब में शांति की बहाली |
ऑपरेशन ब्लू स्टार (जून 1984)
- भिंडरावाले एवं उनके सशस्त्र साथियों ने स्वर्ण मंदिर परिसर में शरण ली।
- भारतीय सेना ने जून 1984 में स्वर्ण मंदिर परिसर में प्रवेश किया।
- इस ऑपरेशन में अनेक निर्दोष लोगों की मृत्यु हुई।
- सिख समुदाय की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं।
- अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या कर दी गई।
- इसके बाद देश में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे।
⭐ महत्वपूर्ण बिंदु
पंजाब की समस्या ने यह सिद्ध किया कि यदि किसी क्षेत्र की वैध माँगों को समय पर नहीं सुना जाए, तो वे अलगाववाद का रूप ले सकती हैं। 1985 के राजीव-लोंगोवाल समझौते के बाद पंजाब में धीरे-धीरे शांति बहाल हुई।
5. उत्तर-पूर्वी राज्यों की समस्या
पृष्ठभूमि
- उत्तर-पूर्व भारत में आठ राज्य हैं — असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा एवं सिक्किम।
- यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से शेष भारत से जुड़ा है, परंतु सांस्कृतिक एवं जातीय रूप से भिन्न है।
- यहाँ अनेक जनजातियाँ एवं समुदाय रहते हैं।
- अंग्रेजों के समय से ही इस क्षेत्र में अलगाव की भावना थी।
- स्वतंत्रता के बाद कुछ समूहों ने अलगाववादी आंदोलन शुरू किए।
उत्तर-पूर्व की प्रमुख समस्याएँ
- जातीय विविधता — अनेक जनजातियाँ एवं समुदाय।
- भूमि विवाद — जनजातियों के बीच भूमि विवाद।
- अवैध प्रवासन — बांग्लादेश से अवैध प्रवासन।
- अलगाववाद — नागा, मिजो, बोडो आदि आंदोलन।
- उग्रवाद — विभिन्न उग्रवादी समूह।
- विकास की कमी — आर्थिक पिछड़ापन।
- भौगोलिक अलगाव — शेष भारत से कमजोर संपर्क।
- बाहरी समर्थन — चीन, म्यांमार, बांग्लादेश का प्रभाव।
उत्तर-पूर्व के प्रमुख आंदोलन
| आंदोलन | राज्य | मुख्य माँग |
|---|---|---|
| नागा आंदोलन | नागालैंड | स्वतंत्र नागालैंड |
| मिजो आंदोलन | मिजोरम | स्वतंत्र मिजोरम |
| बोडो आंदोलन | असम | अलग बोडोलैंड |
| असम आंदोलन | असम | अवैध प्रवासन का विरोध |
| मणिपुर आंदोलन | मणिपुर | स्वायत्तता |
| त्रिपुरा आंदोलन | त्रिपुरा | जनजातीय अधिकार |
💡 उदाहरण
1950 के दशक में नागालैंड में अलग देश की माँग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ। 1963 में नागालैंड भारत का एक अलग राज्य बना। परंतु कुछ उग्रवादी समूह अभी भी अलग नागालैंड की माँग करते हैं।
6. असम आंदोलन एवं बोडो समस्या
असम आंदोलन (1979–1985)
- 1979 में असम में अवैध प्रवासन के विरुद्ध आंदोलन शुरू हुआ।
- बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों की संख्या बढ़ने से स्थानीय लोगों में असंतोष बढ़ा।
- असम गण परिषद (AGP) ने आंदोलन का नेतृत्व किया।
- आंदोलन का नारा था — “विदेशियों को बाहर निकालो”।
- 1985 में असम समझौता हुआ।
- इस समझौते के तहत 1971 के बाद आए प्रवासियों को पहचानने एवं निर्वासित करने का निर्णय लिया गया।
असम समझौता (1985)
- 15 अगस्त 1985 को हस्ताक्षरित।
- राजीव गांधी एवं असम आंदोलन के नेताओं के बीच।
- 1 जनवरी 1966 से पहले आए लोगों को नागरिकता।
- 1966–1971 के बीच आए लोगों को मताधिकार से वंचित रखने का प्रस्ताव।
- 1971 के बाद आए लोगों को निर्वासित करने का निर्णय।
- असम में चुनाव कराने का निर्णय।
बोडो समस्या
- असम में बोडो जनजाति के लोग अलग राज्य “बोडोलैंड” की माँग करते हैं।
- बोडो समुदाय की अपनी भाषा, संस्कृति एवं पहचान है।
- 1980 के दशक में बोडो आंदोलन तेज हुआ।
- बोडो सुरक्षा बल (Bodo Security Force) का गठन हुआ।
- 2003 में बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद का गठन हुआ।
- 2020 में बोडो शांति समझौता हुआ।
📌 महत्वपूर्ण तथ्य
1985 का असम समझौता भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी उपलब्धि थी। इसने असम आंदोलन को शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त किया। इसी प्रकार 2020 के बोडो शांति समझौते ने बोडो समस्या का समाधान खोजने का प्रयास किया।
7. नागालैंड एवं मिजोरम की समस्या
(क) नागालैंड की समस्या
- नागा जनजाति ने 1950 के दशक से अलग देश की माँग उठाई।
- नागा नेशनल काउंसिल (NNC) ने आंदोलन का नेतृत्व किया।
- 1956 में नागा आंदोलन हिंसक हो गया।
- 1960 में सरकार ने नागा लोगों को विशेष अधिकार देने का प्रस्ताव रखा।
- 1963 में नागालैंड भारत का अलग राज्य बना।
- परंतु कुछ उग्रवादी समूह अभी भी अलग नागालैंड की माँग करते हैं।
- 1975 में शिलांग समझौता हुआ।
- 1997 में नागा उग्रवादियों एवं सरकार के बीच युद्ध विराम हुआ।
(ख) मिजोरम की समस्या
- 1966 में मिजोरम में अलग देश की माँग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ।
- मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) ने आंदोलन का नेतृत्व किया।
- लालडेंगा ने आंदोलन का नेतृत्व किया।
- 1966 से 1986 तक मिजोरम में उग्रवाद जारी रहा।
- 1986 में मिजोरम शांति समझौता हुआ।
- 1987 में मिजोरम भारत का अलग राज्य बना।
- लालडेंगा मुख्यमंत्री बने।
💡 उदाहरण
1986 के मिजोरम शांति समझौते के बाद मिजोरम भारत का एक शांतिपूर्ण राज्य बन गया। यह सिद्ध करता है कि संवाद एवं वार्ता से अलगाववादी आंदोलनों का समाधान संभव है। लालडेंगा जैसे उग्रवादी नेता बाद में लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हो गए।
8. सिक्किम का भारत में विलय
पृष्ठभूमि
- सिक्किम 1947 तक एक स्वतंत्र रियासत था।
- 1947 में भारत एवं सिक्किम के बीच एक संधि हुई।
- 1950 में सिक्किम भारत का संरक्षित राज्य बना।
- सिक्किम में चोग्याल (राजा) का शासन था।
- 1970 के दशक में सिक्किम में लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू हुआ।
- 1973 में सिक्किम में विद्रोह हुआ।
- 1975 में जनमत संग्रह हुआ।
- जनता ने भारत में विलय के पक्ष में मतदान किया।
- 1975 में सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना।
सिक्किम विलय का महत्व
- यह भारतीय लोकतंत्र की जीत थी।
- जनता की इच्छा का सम्मान किया गया।
- सिक्किम में विकास एवं शांति स्थापित हुई।
- सिक्किम भारत का सबसे शांतिपूर्ण राज्य बना।
- सिक्किम को विशेष राज्य का दर्जा दिया गया।
📌 महत्वपूर्ण तथ्य
1975 में सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना। यह विलय जनमत संग्रह के माध्यम से हुआ, जिसमें जनता ने भारत के साथ रहने का निर्णय लिया। यह भारतीय लोकतंत्र एवं संघवाद की एक बड़ी सफलता थी।
9. तमिलनाडु एवं द्रविड़ आंदोलन
पृष्ठभूमि
- तमिलनाडु में 20वीं सदी के प्रारंभ से ही द्रविड़ आंदोलन सक्रिय था।
- इसका उद्देश्य द्रविड़ संस्कृति एवं भाषा की रक्षा था।
- 1930 के दशक में “द्रविड़ कज़गम” की स्थापना हुई।
- 1944 में द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (DMK) की स्थापना हुई।
- 1967 में DMK ने पहली बार तमिलनाडु में सरकार बनाई।
- तब से तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों का शासन रहा।
द्रविड़ आंदोलन की माँगें
- तमिल भाषा की रक्षा एवं विकास।
- ब्राह्मणवाद का विरोध।
- सामाजिक समानता।
- द्रविड़ संस्कृति की रक्षा।
- तमिलनाडु की स्वायत्तता।
- हिंदी थोपने का विरोध।
- आरक्षण का समर्थन।
भाषा आंदोलन (1965)
- 1965 में हिंदी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया गया।
- तमिलनाडु में इसका व्यापक विरोध हुआ।
- छात्रों ने आंदोलन शुरू किया।
- आंदोलन हिंसक हो गया।
- सरकार ने तमिलनाडु में हिंदी को अनिवार्य नहीं करने का आश्वासन दिया।
- इसके बाद तमिलनाडु में क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व बढ़ा।
💡 उदाहरण
1965 के भाषा आंदोलन में तमिलनाडु के छात्रों ने हिंदी के विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया। इस आंदोलन में कई लोगों की मृत्यु हुई। अंततः सरकार को झुकना पड़ा और हिंदी को अनिवार्य भाषा नहीं बनाया गया।
10. भाषा एवं क्षेत्रीय अस्मिता
भाषा आंदोलन के कारण
- भाषाई पहचान — भाषा को संस्कृति एवं पहचान का आधार माना गया।
- हिंदी थोपने का विरोध — गैर-हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी का विरोध।
- राज्य पुनर्गठन — भाषा के आधार पर राज्यों की माँग।
- शिक्षा एवं रोजगार — भाषा के आधार पर शिक्षा एवं रोजगार।
- राजनीतिक स्वार्थ — दलों ने भाषा को मुद्दा बनाया।
भाषा के आधार पर राज्यों का गठन
| राज्य | वर्ष | भाषा |
|---|---|---|
| आंध्र प्रदेश | 1953 | तेलुगु |
| महाराष्ट्र एवं गुजरात | 1960 | मराठी एवं गुजराती |
| पंजाब एवं हरियाणा | 1966 | पंजाबी एवं हिंदी |
| नागालैंड | 1963 | नागा |
| मेघालय | 1972 | खासी, गारो |
| मिजोरम | 1987 | मिजो |
| अरुणाचल प्रदेश | 1987 | अनेक |
राज्य पुनर्गठन आयोग (1953)
- 1953 में फजल अली आयोग का गठन हुआ।
- 1955 में आयोग ने रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित हुआ।
- भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन किया गया।
- इससे भाषाई आकांक्षाओं को शांत किया गया।
- परंतु कुछ नए क्षेत्रीय आंदोलन भी उभरे।
📌 महत्वपूर्ण तथ्य
1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम ने भारत में भाषा के आधार पर राज्यों का गठन किया। इससे अनेक भाषाई आकांक्षाओं को शांत किया गया, परंतु कुछ नई क्षेत्रीय आकांक्षाएँ भी जन्मीं।
11. “Sons of the Soil” (भूमि पुत्र) की अवधारणा
📖 परिभाषा — सons of the Soil (भूमि पुत्र)
“भूमि पुत्र” की अवधारणा का अर्थ है कि किसी विशेष क्षेत्र के मूल निवासियों को शिक्षा एवं रोजगार में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह अवधारणा क्षेत्रीय अस्मिता एवं स्थानीय हितों की रक्षा पर आधारित है।
अवधारणा के कारण
- बाहरी लोगों का रोजगार पर अधिकार।
- स्थानीय लोगों की उपेक्षा।
- भाषा एवं संस्कृति पर खतरा।
- आर्थिक अवसरों की कमी।
- जनसंख्या का दबाव।
- राजनीतिक कारण।
उदाहरण
- महाराष्ट्र — शिवसेना ने “भूमि पुत्र” की माँग उठाई।
- असम — असम आंदोलन में अवैध प्रवासियों का विरोध।
- कर्नाटक — कन्नड़ लोगों को रोजगार में प्राथमिकता।
- आंध्र प्रदेश — तेलुगु लोगों को प्राथमिकता।
- मध्य प्रदेश — स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकता।
💡 उदाहरण
1960 के दशक में महाराष्ट्र में शिवसेना ने “भूमि पुत्र” की अवधारणा को बल दिया। इसका उद्देश्य महाराष्ट्र के मूल निवासियों को रोजगार में प्राथमिकता दिलाना था। इसी प्रकार कर्नाटक में भी “कन्नड़ लोगों को पहले” का नारा उठा।
12. झारखंड, उत्तराखंड एवं छत्तीसगढ़ का गठन
(क) झारखंड
- झारखंड आंदोलन 1950 के दशक से चल रहा था।
- आदिवासियों की भूमि एवं पहचान की रक्षा मुख्य मुद्दा था।
- 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना।
- यह बिहार से अलग होकर बना।
- राजधानी — राँची।
(ख) उत्तराखंड
- उत्तराखंड आंदोलन 1990 के दशक में तेज हुआ।
- पहाड़ी क्षेत्रों की उपेक्षा मुख्य मुद्दा था।
- 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य बना।
- यह उत्तर प्रदेश से अलग होकर बना।
- राजधानी — देहरादून।
(ग) छत्तीसगढ़
- छत्तीसगढ़ आंदोलन 1990 के दशक में तेज हुआ।
- आदिवासी क्षेत्रों की उपेक्षा मुख्य मुद्दा था।
- 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना।
- यह मध्य प्रदेश से अलग होकर बना।
- राजधानी — रायपुर।
नए राज्यों के गठन का महत्व
- छोटे राज्यों का प्रशासन सुगम हुआ।
- विकास में तेजी आई।
- स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ी।
- क्षेत्रीय आकांक्षाओं को शांत किया गया।
- संघवाद को मजबूती मिली।
📌 महत्वपूर्ण तथ्य
2000 में तीन नए राज्य बने — झारखंड (15 नवंबर), उत्तराखंड (9 नवंबर) एवं छत्तीसगढ़ (1 नवंबर)। इससे पहले 1956 के बाद भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ था। 2014 में तेलंगाना भारत का 29वाँ राज्य बना।
13. क्षेत्रीय दलों की भूमिका
क्षेत्रीय दलों का उदय
- 1967 के बाद क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ।
- तमिलनाडु में DMK, AIADMK।
- पंजाब में अकाली दल।
- जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस।
- उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, BSP।
- बिहार में RJD, JDU।
- आंध्र प्रदेश में TDP।
- महाराष्ट्र में शिवसेना।
क्षेत्रीय दलों की भूमिका
- क्षेत्रीय हितों की रक्षा — अपने क्षेत्र के हितों की रक्षा।
- संस्कृति एवं भाषा — स्थानीय भाषा एवं संस्कृति को बढ़ावा।
- केंद्र पर दबाव — केंद्र सरकार पर दबाव डालना।
- गठबंधन राजनीति — केंद्र में गठबंधन सरकारों में भागीदारी।
- विकास — अपने क्षेत्र के विकास पर बल।
- राजनीतिक भागीदारी — स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाना।
- संघवाद — संघवाद को मजबूत करना।
- जनता की आवाज — जनता की आवाज उठाना।
क्षेत्रीय दलों का महत्व
- ये राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय हितों को शामिल करते हैं।
- ये संघवाद को मजबूत करते हैं।
- ये लोकतंत्र को अधिक प्रतिनिधित्वात्मक बनाते हैं।
- ये जनता की समस्याओं को सदन में उठाते हैं।
- ये केंद्र सरकार पर दबाव डालते हैं।
- ये क्षेत्रीय विकास में सहायक होते हैं।
💡 उदाहरण
1996 के बाद से भारत में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। क्षेत्रीय दलों की भूमिका केंद्र में निर्णायक हो गई। तमिलनाडु के DMK एवं AIADMK, बिहार के RJD एवं JDU जैसे दलों ने केंद्र सरकारों के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
14. केंद्र-राज्य संबंध एवं सहकारी संघवाद
📖 परिभाषा — संघवाद (Federalism)
संघवाद शासन की वह व्यवस्था है, जिसमें शक्तियाँ केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों के बीच विभाजित रहती हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं। भारत में संघवाद की व्यवस्था है, परंतु केंद्र को अधिक शक्तियाँ प्राप्त हैं।
📖 परिभाषा — सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)
सहकारी संघवाद से तात्पर्य केंद्र एवं राज्यों के बीच सहयोग एवं समन्वय की उस व्यवस्था से है, जिसमें दोनों मिलकर राष्ट्रीय विकास एवं जनकल्याण के कार्यों को पूरा करते हैं। इसमें टकराव के स्थान पर सहयोग पर बल दिया जाता है।
केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव के कारण
- राज्यों की शक्तियों में कमी।
- राज्यपाल की भूमिका।
- वित्तीय संसाधनों का असमान वितरण।
- केंद्र सरकार द्वारा राज्यों में हस्तक्षेप।
- अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग।
- राजनीतिक मतभेद।
- क्षेत्रीय दलों का उभार।
सहकारी संघवाद को मजबूत करने के उपाय
- राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता।
- राज्यपाल की भूमिका में सुधार।
- अंतर-राज्य परिषद् का सक्रिय उपयोग।
- वित्त आयोग का प्रभावी कार्य।
- राज्यों की सहमति से नीतियाँ बनाना।
- राष्ट्रीय विकास परिषद् का पुनर्गठन।
- राज्यों के साथ संवाद बढ़ाना।
- गठबंधन सरकारों में सहयोग।
📌 महत्वपूर्ण तथ्य
भारतीय संविधान में संघात्मक व्यवस्था है, परंतु केंद्र को अधिक शक्तियाँ दी गई हैं। इसलिए भारत को “अर्ध-संघात्मक” या “संघात्मक झुकाव वाला एकात्मक” राज्य कहा जाता है। क्षेत्रीय आकांक्षाओं के समाधान के लिए सहकारी संघवाद आवश्यक है।
15. क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान
समाधान के उपाय
- संवाद एवं वार्ता — आंदोलनकारियों से बातचीत करना।
- राजनीतिक समाधान — राजनीतिक माँगों को स्वीकार करना।
- आर्थिक विकास — पिछड़े क्षेत्रों का विकास।
- संसाधनों का समान वितरण — संसाधनों का उचित बँटवारा।
- सांस्कृतिक रक्षा — भाषा एवं संस्कृति की रक्षा।
- स्वायत्तता — कुछ क्षेत्रों को विशेष अधिकार।
- नए राज्यों का गठन — आवश्यकता पड़ने पर नए राज्य बनाना।
- संघवाद को मजबूत करना — राज्यों को अधिक अधिकार।
- जनभागीदारी — स्थानीय लोगों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना।
- शांतिपूर्ण समाधान — हिंसा के स्थान पर शांतिपूर्ण तरीके।
सफल समाधान के उदाहरण
| आंदोलन | समाधान | वर्ष |
|---|---|---|
| मिजो आंदोलन | मिजोरम शांति समझौता | 1986 |
| असम आंदोलन | असम समझौता | 1985 |
| पंजाब आंदोलन | राजीव-लोंगोवाल समझौता | 1985 |
| बोडो आंदोलन | बोडो शांति समझौता | 2020 |
| झारखंड आंदोलन | झारखंड राज्य का गठन | 2000 |
| तेलंगाना आंदोलन | तेलंगाना राज्य का गठन | 2014 |
⭐ महत्वपूर्ण निष्कर्ष
क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतंत्र में स्वाभाविक हैं। यदि इनका समाधान संवाद, वार्ता एवं लोकतांत्रिक तरीकों से किया जाए, तो ये राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा नहीं बनतीं। भारत ने अनेक क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान लोकतांत्रिक ढंग से किया है, जो भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण है।
16. महत्वपूर्ण तिथियाँ एवं तथ्य
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1947 | कश्मीर का भारत में विलय; पंजाब का विभाजन |
| 1948 | कश्मीर मामला संयुक्त राष्ट्र में |
| 1950 | सिक्किम भारत का संरक्षित राज्य बना |
| 1953 | आंध्र प्रदेश का गठन; फजल अली आयोग |
| 1956 | राज्य पुनर्गठन अधिनियम |
| 1960 | महाराष्ट्र एवं गुजरात का गठन |
| 1963 | नागालैंड का गठन |
| 1965 | तमिलनाडु में भाषा आंदोलन |
| 1966 | पंजाब एवं हरियाणा का गठन; मिजो आंदोलन |
| 1972 | शिमला समझौता; मेघालय का गठन |
| 1973 | आनंदपुर साहिब प्रस्ताव |
| 1975 | सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना |
| 1979 | असम आंदोलन का प्रारंभ |
| 1984 | ऑपरेशन ब्लू स्टार; इंदिरा गांधी की हत्या |
| 1985 | असम समझौता; राजीव-लोंगोवाल समझौता |
| 1986 | मिजोरम शांति समझौता |
| 1987 | मिजोरम एवं अरुणाचल प्रदेश का गठन |
| 1989 | कश्मीर में उग्रवाद शुरू |
| 2000 | झारखंड, उत्तराखंड एवं छत्तीसगढ़ का गठन |
| 2003 | बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद का गठन |
| 2014 | तेलंगाना राज्य का गठन |
| 2019 | अनुच्छेद 370 की समाप्ति |
| 2020 | बोडो शांति समझौता |
⭐ अति महत्वपूर्ण तथ्य (याद रखें)
- कश्मीर का भारत में विलय — 1947
- अनुच्छेद 370 की समाप्ति — 5 अगस्त 2019
- आनंदपुर साहिब प्रस्ताव — 1973
- ऑपरेशन ब्लू स्टार — जून 1984
- असम समझौता — 1985
- मिजोरम शांति समझौता — 1986
- सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य — 1975
- झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ — 2000
- तेलंगाना — 2014
- बोडो शांति समझौता — 2020
17. महत्वपूर्ण प्रश्न (परीक्षा के लिए)
वस्तुनिष्ठ प्रश्न (1 अंक)
- क्षेत्रवाद क्या है? (क्षेत्रीय हितों की रक्षा की प्रवृत्ति)
- अनुच्छेद 370 कब समाप्त हुआ? (2019)
- ऑपरेशन ब्लू स्टार कब हुआ? (1984)
- असम समझौता कब हुआ? (1985)
- मिजोरम शांति समझौता कब हुआ? (1986)
- सिक्किम भारत का कौन सा राज्य बना? (22वाँ)
- झारखंड राज्य का गठन कब हुआ? (2000)
- तेलंगाना राज्य का गठन कब हुआ? (2014)
- आनंदपुर साहिब प्रस्ताव कब आया? (1973)
- “भूमि पुत्र” की अवधारणा किससे संबंधित है? (स्थानीय निवासियों को रोजगार में प्राथमिकता)
लघु उत्तरीय प्रश्न (2–3 अंक)
- क्षेत्रीय आकांक्षा से आप क्या समझते हैं?
- क्षेत्रवाद के प्रमुख कारण बताइए।
- जम्मू-कश्मीर की समस्या के कारण बताइए।
- खालिस्तान आंदोलन के कारण एवं परिणाम बताइए।
- असम समझौते की मुख्य बातें बताइए।
- मिजोरम शांति समझौते का महत्व स्पष्ट कीजिए।
- सिक्किम के भारत में विलय की प्रक्रिया बताइए।
- द्रविड़ आंदोलन की मुख्य माँगें बताइए।
- नए राज्यों के गठन का क्या महत्व है?
- क्षेत्रीय दलों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)
- क्षेत्रीय आकांक्षाओं के कारणों एवं स्वरूपों की विवेचना करें।
- जम्मू-कश्मीर की समस्या की विस्तृत विवेचना करें।
- पंजाब की समस्या एवं खालिस्तान आंदोलन का वर्णन करें।
- उत्तर-पूर्वी राज्यों की समस्याओं की व्याख्या करें।
- असम आंदोलन एवं बोडो समस्या की विवेचना करें।
- भाषा एवं क्षेत्रीय अस्मिता के संबंध को स्पष्ट करें।
- झारखंड, उत्तराखंड एवं छत्तीसगढ़ के गठन की प्रक्रिया बताइए।
- केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव के कारण एवं समाधान बताइए।
दीर्घ निबंधात्मक प्रश्न (8–10 अंक)
- भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाओं के उदय के कारणों एवं स्वरूपों की विस्तृत विवेचना करें।
- जम्मू-कश्मीर, पंजाब एवं उत्तर-पूर्व की समस्याओं की तुलनात्मक विवेचना करें।
- “भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाओं का समाधान लोकतांत्रिक ढंग से किया गया” — इस कथन की समीक्षा करें।
- क्षेत्रीय दलों की भूमिका एवं सहकारी संघवाद की विवेचना करें।
- भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया एवं उसके परिणामों का मूल्यांकन करें।
⭐ परीक्षा टिप्स
- तिथियों (1973, 1984, 1985, 1986, 2000, 2014, 2019) को अच्छी तरह याद करें।
- “खालिस्तान”, “असम समझौता”, “मिजोरम शांति समझौता”, “अनुच्छेद 370” एवं “नए राज्यों का गठन” से हर वर्ष प्रश्न आते हैं।
- उत्तर में तथ्य एवं उदाहरण अवश्य लिखें।
- प्रत्येक आंदोलन के कारण, नेता, वर्ष एवं परिणाम अलग-अलग याद करें।
- सारणी बनाकर उत्तर लिखने से अंक अधिक मिलते हैं।
- क्षेत्रीय आकांक्षाओं के सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पहलुओं को संतुलित रूप से लिखें।
