कक्षा 12 इतिहास – अध्याय 10: उपनिवेशवाद और देहात (सरकारी रिपोर्टों के साक्ष्य)

अठारहवीं शताब्दी के अंत से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपना राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करना शुरू किया। इसके साथ ही भारतीय देहात (ग्रामीण क्षेत्र) में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। अंग्रेजों ने भूमि राजस्व व्यवस्था में परिवर्तन किए, जिससे किसानों, जमींदारों और ग्रामीण समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस अध्याय में हम सरकारी रिपोर्टों के साक्ष्यों के माध्यम से उपनिवेशवाद के काल में भारतीय देहात में हुए परिवर्तनों का अध्ययन करेंगे।

सरकारी रिपोर्टें, सर्वेक्षण, गजेटियर, अधिकारियों के पत्र और रिपोर्टें उस काल के ग्रामीण जीवन को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन रिपोर्टों से हमें भूमि व्यवस्था, कृषि, किसानों की स्थिति, विद्रोहों और ग्रामीण समाज के बारे में जानकारी मिलती है।

इस अध्याय का शीर्षक “उपनिवेशवाद और देहात” इसलिए रखा गया है क्योंकि यह अध्याय उपनिवेशवाद के प्रभाव में भारतीय ग्रामीण समाज में हुए परिवर्तनों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है।

1. सरकारी रिपोर्टें – स्रोत के रूप में

1.1 सरकारी रिपोर्टों का महत्व

  • सरकारी रिपोर्टें उपनिवेशवाद के काल की महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
  • ये अंग्रेज अधिकारियों द्वारा तैयार की जाती थीं।
  • इनमें ग्रामीण समाज, कृषि और भूमि व्यवस्था का वर्णन है।
  • ये प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए बनाई जाती थीं।
  • इनसे अंग्रेजों की नीतियों का पता चलता है।

1.2 सरकारी रिपोर्टों के प्रकार

  • सर्वेक्षण रिपोर्टें – भूमि, कृषि और समाज का सर्वेक्षण।
  • गजेटियर – जिलों का विस्तृत वर्णन।
  • अधिकारियों की रिपोर्टें – स्थानीय स्थितियों का वर्णन।
  • आयोगों की रिपोर्टें – विशेष समस्याओं की जाँच।
  • राजस्व रिपोर्टें – भूमि राजस्व व्यवस्था की रिपोर्ट।

1.3 सरकारी रिपोर्टों की सीमाएँ

  • ये अंग्रेज अधिकारियों के दृष्टिकोण से लिखी गई थीं।
  • इनमें भारतीयों के प्रति पूर्वाग्रह था।
  • ये प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए बनाई गई थीं।
  • इनमें आम लोगों की आवाज़ कम है।
  • इन्हें भारतीय स्रोतों के साथ पढ़ना चाहिए।
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2. ब्रिटिश शासन की स्थापना

2.1 प्लासी का युद्ध (1757 ईस्वी)

  • प्लासी का युद्ध 1757 ईस्वी में हुआ।
  • रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला को पराजित किया।
  • इस युद्ध के बाद बंगाल में अंग्रेजों का राजनीतिक वर्चस्व स्थापित हुआ।
  • मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया गया।

2.2 बक्सर का युद्ध (1764 ईस्वी)

  • बक्सर का युद्ध 1764 ईस्वी में हुआ।
  • अंग्रेजों ने मीर कासिम, शुजाउद्दौला और शाह आलम द्वितीय को पराजित किया।
  • इस युद्ध के बाद अंग्रेज बंगाल, बिहार और उड़ीसा के वास्तविक शासक बन गए।
  • इलाहाबाद की संधि (1765) हुई।

2.3 द्वैध शासन (1765-1772 ईस्वी)

  • 1765 ईस्वी में द्वैध शासन शुरू हुआ।
  • इसमें राजस्व वसूलने का अधिकार कंपनी को मिला।
  • प्रशासन नवाब के पास रहा।
  • इस व्यवस्था का परिणाम ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बुरा पड़ा।
  • 1772 ईस्वी में वारेन हेस्टिंग्स ने द्वैध शासन समाप्त किया।
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3. भूमि राजस्व व्यवस्थाएँ

3.1 स्थायी बंदोबस्त (1793 ईस्वी)

  • स्थायी बंदोबस्त 1793 ईस्वी में लॉर्ड कॉर्नवालिस ने लागू किया।
  • यह मुख्यतः बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू किया गया।
  • जमींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी बना दिया गया।
  • जमींदारों को निश्चित राजस्व राज्य को देना होता था।
  • राजस्व न देने पर जमींदारी जब्त हो जाती थी।
  • इस व्यवस्था से जमींदारों को लाभ हुआ।
  • किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ।

स्थायी बंदोबस्त के प्रभाव

  • जमींदार वर्ग का उदय हुआ।
  • किसानों का शोषण बढ़ा।
  • भूमि बाजार का विकास हुआ।
  • कृषि का व्यावसायीकरण हुआ।
  • कृषि उत्पादन में गिरावट आई।

3.2 रैयतवाड़ी व्यवस्था (1820 ईस्वी)

  • रैयतवाड़ी व्यवस्था 1820 ईस्वी में लागू की गई।
  • यह मुख्यतः मद्रास और बॉम्बे प्रेसीडेंसी में लागू हुई।
  • इसमें किसान (रैयत) भूमि का स्वामी माना गया।
  • किसान सीधे राज्य को राजस्व देता था।
  • इसमें कोई बिचौलिया नहीं था।
  • राजस्व दर अधिक थी।
  • इससे किसानों पर बोझ बढ़ा।

3.3 महालवाड़ी व्यवस्था (1822 ईस्वी)

  • महालवाड़ी व्यवस्था 1822 ईस्वी में लागू की गई।
  • यह मुख्यतः उत्तर प्रदेश और मध्य भारत में लागू हुई।
  • इसमें महाल (गाँवों का समूह) राजस्व इकाई था।
  • महाल के मालिक या जमींदार राजस्व देते थे।
  • इसमें सामूहिक जिम्मेदारी थी।
  • इस व्यवस्था का भी किसानों पर बुरा प्रभाव पड़ा।
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4. ग्रामीण समाज पर प्रभाव

4.1 किसानों की स्थिति

  • भूमि राजस्व दर बहुत अधिक थी।
  • किसानों को अपनी आय का बड़ा भाग राजस्व में देना पड़ता था।
  • राजस्व न देने पर भूमि जब्त हो जाती थी।
  • किसान साहूकारों से कर्ज लेते थे।
  • अत्यधिक कर्ज से किसान कंगाल हो जाते थे।
  • कई किसान भूमिहीन मजदूर बन गए।

4.2 जमींदारों की स्थिति

  • स्थायी बंदोबस्त से जमींदार लाभान्वित हुए।
  • जमींदार भूमि के मालिक बन गए।
  • कुछ जमींदार बड़े भूस्वामी बन गए।
  • कुछ जमींदार राजस्व न देने पर जमींदारी खो बैठे।
  • नए जमींदार वर्ग का उदय हुआ।
  • अनेक जमींदार शहरों में रहने लगे।

4.3 ग्रामीण अर्थव्यवस्था

  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा।
  • कृषि उत्पादन में गिरावट आई।
  • गाँवों में कारीगरों की स्थिति खराब हुई।
  • अकाल और भुखमरी बढ़ी।
  • ग्रामीण गरीबी बढ़ी।
  • गाँवों से पलायन हुआ।
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5. कृषि का व्यावसायीकरण

5.1 व्यावसायीकरण का अर्थ

कृषि का व्यावसायीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें किसान बाजार के लिए फसल उगाते हैं, न कि अपनी आवश्यकताओं के लिए। अंग्रेजों ने भारतीय कृषि को व्यावसायिक बनाया।

5.2 व्यावसायीकरण के कारण

  • अंग्रेजों को कच्चे माल की आवश्यकता थी।
  • भारतीय कृषि उत्पादों की माँग बढ़ी।
  • रेल और परिवहन का विकास हुआ।
  • बाजार का विस्तार हुआ।
  • राजस्व नकद रूप में लेना शुरू किया गया।

5.3 व्यावसायिक फसलें

  • नील – बंगाल में नील की खेती।
  • कपास – महाराष्ट्र और गुजरात में।
  • अफीम – बिहार और उत्तर प्रदेश में।
  • जूट – बंगाल में।
  • चाय – असम में।
  • गन्ना – उत्तर प्रदेश में।

5.4 व्यावसायीकरण के प्रभाव

  • किसानों को बाजार पर निर्भर रहना पड़ा।
  • कीमतों में उतार-चढ़ाव से किसान प्रभावित हुए।
  • खाद्यान्न उत्पादन में कमी आई।
  • अकाल की समस्या बढ़ी।
  • किसानों का शोषण हुआ।
  • नील की खेती से किसान विशेष रूप से पीड़ित हुए।
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6. ग्रामीण विद्रोह

6.1 विद्रोह के कारण

  • अत्यधिक भूमि राजस्व।
  • किसानों का शोषण।
  • नील की खेती के लिए मजबूरी।
  • जमींदारों और साहूकारों का अत्याचार।
  • भूमि से बेदखली।
  • अकाल और भुखमरी।

6.2 प्रमुख ग्रामीण विद्रोह

सन्यासी विद्रोह (1763-1800 ईस्वी)

  • यह बंगाल में हुआ।
  • सन्यासियों और फकीरों ने विद्रोह किया।
  • इसका कारण भूमि राजस्व और शोषण था।

चुआड़ विद्रोह (1769-1805 ईस्वी)

  • यह बंगाल में हुआ।
  • चुआड़ जनजाति ने विद्रोह किया।
  • इसका कारण भूमि राजस्व और शोषण था।

कोल विद्रोह (1831-32 ईस्वी)

  • यह छोटानागपुर में हुआ।
  • कोल जनजाति ने विद्रोह किया।
  • इसका कारण बाहरी लोगों का शोषण था।

संथाल विद्रोह (1855-56 ईस्वी)

  • यह बंगाल और बिहार में हुआ।
  • संथाल जनजाति ने विद्रोह किया।
  • इसका कारण जमींदारों और साहूकारों का शोषण था।
  • इसका नेतृत्व सिद्धू और कान्हू ने किया।

नील विद्रोह (1859-60 ईस्वी)

  • यह बंगाल में हुआ।
  • किसानों ने नील की खेती के विरोध में विद्रोह किया।
  • इसका नेतृत्व दीनबंधु मित्र ने किया।
  • इसके परिणामस्वरूप नील आयोग (1860) गठित हुआ।
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7. सूखा और अकाल

7.1 अकाल के कारण

  • अत्यधिक भूमि राजस्व।
  • कृषि का व्यावसायीकरण।
  • खाद्यान्न उत्पादन में कमी।
  • वर्षा में अनियमितता।
  • सिंचाई सुविधाओं का अभाव।
  • परिवहन की कमी।
  • सरकारी उदासीनता।

7.2 प्रमुख अकाल

  • बंगाल का अकाल (1770) – लगभग एक करोड़ लोग मारे गए।
  • चालीसा का अकाल (1783) – उत्तर भारत में।
  • अकाल (1876-78) – मद्रास, बॉम्बे, मध्य भारत में।
  • बंगाल का अकाल (1943) – लगभग 30 लाख लोग मारे गए।

7.3 अकाल आयोग

  • 1880 ईस्वी में अकाल आयोग गठित किया गया।
  • इसने अकाल से बचाव के उपाय सुझाए।
  • सिंचाई के विकास पर जोर दिया गया।
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8. महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

  • स्थायी बंदोबस्त – 1793 ईस्वी में लागू भूमि राजस्व व्यवस्था।
  • रैयतवाड़ी – 1820 ईस्वी में लागू भूमि राजस्व व्यवस्था।
  • महालवाड़ी – 1822 ईस्वी में लागू भूमि राजस्व व्यवस्था।
  • जमींदार – भूमि का मालिक, राजस्व वसूलने वाला।
  • रैयत – किसान।
  • महाल – गाँवों का समूह।
  • व्यावसायीकरण – बाजार के लिए खेती।
  • द्वैध शासन – 1765-1772 ईस्वी की शासन व्यवस्था।
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9. महत्वपूर्ण तथ्य

  • प्लासी का युद्ध 1757 ईस्वी में हुआ।
  • बक्सर का युद्ध 1764 ईस्वी में हुआ।
  • द्वैध शासन 1765 ईस्वी में शुरू हुआ।
  • स्थायी बंदोबस्त 1793 ईस्वी में लागू हुआ।
  • रैयतवाड़ी व्यवस्था 1820 ईस्वी में लागू हुई।
  • महालवाड़ी व्यवस्था 1822 ईस्वी में लागू हुई।
  • बंगाल का अकाल 1770 ईस्वी में हुआ।
  • संथाल विद्रोह 1855-56 ईस्वी में हुआ।
  • नील विद्रोह 1859-60 ईस्वी में हुआ।
  • नील आयोग 1860 ईस्वी में गठित हुआ।
  • अकाल आयोग 1880 ईस्वी में गठित हुआ।
  • बंगाल का अकाल 1943 ईस्वी में हुआ।
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10. निष्कर्ष

अध्याय 10 “उपनिवेशवाद और देहात” उपनिवेशवाद के काल में भारतीय ग्रामीण समाज में हुए परिवर्तनों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह अध्याय हमें सिखाता है:

  • सरकारी रिपोर्टें – ये उपनिवेशवाद के काल की महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
  • भूमि राजस्व व्यवस्थाएँ – स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी।
  • ग्रामीण समाज पर प्रभाव – किसानों का शोषण, जमींदारों का उदय।
  • कृषि का व्यावसायीकरण – बाजार के लिए खेती।
  • ग्रामीण विद्रोह – सन्यासी, चुआड़, कोल, संथाल, नील विद्रोह।
  • सूखा और अकाल – बंगाल का अकाल, चालीसा का अकाल।

इस अध्याय का महत्व:

  • यह उपनिवेशवाद के प्रभाव को समझाता है।
  • यह सरकारी रिपोर्टों को स्रोत के रूप में समझने में सहायक है।
  • यह बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • यह भारतीय किसानों की स्थिति को समझने में सहायक है।
  • यह आगे के अध्यायों को समझने की नींव प्रदान करता है।

इन नोट्स को अपनी परीक्षा की तैयारी के लिए उपयोग करें। सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को अच्छी तरह याद रखें और संभावित प्रश्नों का अभ्यास करें।

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