APNI KAKSHA • BSEB Class 10 Sanskrit
तृतीयः पाठः — आलसकथा
पीयूषम् (भाग-2) • आलस की कथा
पाठ का संक्षिप्त परिचय
“आलसकथा” पाठ में आलस्य के दुष्परिणामों का मार्मिक एवं शिक्षाप्रद चित्रण किया गया है। यह कथा महाकवि कालिदास की परंपरा से जुड़ी एक लोकप्रिय कथा है। इस कथा में एक अत्यंत आलसी ब्राह्मण का वर्णन है, जो परिश्रम से बचने के लिए अनेक बहाने बनाता है। अंत में आलस्य के कारण उसे कैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, यह दर्शाया गया है। कथा का मुख्य संदेश यह है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।
१
आलसी ब्राह्मण का परिचय
संस्कृत पाठ
कस्मिंश्चित् नगरे एकः ब्राह्मणः आसीत्। सः अतीव आलसी आसीत्। परिश्रमं कर्तुं सः कदापि न इच्छति स्म। भोजनं कर्तुं अपि सः आलस्यं करोति स्म।
सरल हिंदी अर्थ
किसी नगर में एक ब्राह्मण रहता था। वह बहुत आलसी था। वह परिश्रम करने के लिए कभी इच्छा नहीं करता था। भोजन करने में भी वह आलस्य करता था।
२
पत्नी की चिंता
संस्कृत पाठ
तस्य ब्राह्मणस्य भार्या अतीव चिन्ताकुला आसीत्। सा एकदा स्वामिनं कथयति— भो स्वामिन्! भवान् सर्वदा आलस्यं करोति, परिश्रमं न करोति। अनेन प्रकारेण गृहस्थाश्रमः कथं निर्वाह्यते?
सरल हिंदी अर्थ
उस ब्राह्मण की पत्नी अत्यंत चिंतित रहती थी। एक बार वह अपने पति से कहती है— हे स्वामी! आप सदा आलस्य करते हैं, परिश्रम नहीं करते। इस प्रकार गृहस्थ जीवन कैसे चलेगा?
३
आलसी का उत्तर
संस्कृत पाठ
ब्राह्मणः शनैः शनैः वदति— भद्रे! परिश्रमेण किं प्रयोजनम्? यदि भाग्यं साहाय्यं करिष्यति तर्हि सर्वं स्वयमेव प्राप्स्यते। परिश्रमं कृत्वा अपि यदि फलं न प्राप्यते तर्हि परिश्रमः व्यर्थः भविष्यति।
सरल हिंदी अर्थ
ब्राह्मण धीरे-धीरे कहता है— हे भद्रे! परिश्रम से क्या लाभ? यदि भाग्य सहायता करेगा तो सब कुछ स्वयं ही प्राप्त हो जाएगा। परिश्रम करके भी यदि फल न मिले तो परिश्रम व्यर्थ हो जाएगा।
भावार्थ
आलसी व्यक्ति सदा भाग्य के भरोसे बैठा रहता है और परिश्रम से बचता है। यह उसकी सबसे बड़ी भूल है।
४
भोजन का आलस्य
संस्कृत पाठ
एकदा भोजनसमये ब्राह्मणः कथयति— भोजनं मम समीपे स्थापयतु। परन्तु यदि भोजनं मुखे न क्षिप्यते तर्हि कथं भोक्ष्ये? अहं तावत् आलस्येन पीडितः अस्मि। मम हस्तौ अपि न उत्थितौ भवतः।
सरल हिंदी अर्थ
एक बार भोजन के समय ब्राह्मण कहता है— भोजन मेरे पास रख दो। परंतु यदि भोजन मुँह में न डाला जाए तो कैसे खाऊँगा? मैं तो आलस्य से पीड़ित हूँ। मेरे हाथ भी नहीं उठते।
५
दान का प्रसंग
संस्कृत पाठ
अपरे दिने ब्राह्मणस्य भार्या कथयति— भोः! यदि अहं भिक्षां दातुं गच्छामि तर्हि भवान् अत्र किम् करिष्यति? ब्राह्मणः वदति— यदि त्वम् एव भिक्षां दद्याः तर्हि मया पुनः किं क्रियते?
सरल हिंदी अर्थ
अगले दिन ब्राह्मण की पत्नी कहती है— हे भो! यदि मैं भिक्षा देने जाऊँ तो आप यहाँ क्या करेंगे? ब्राह्मण कहता है— यदि तुम ही भिक्षा दो तो मुझे फिर क्या करना है?
६
आलसी की दुर्दशा
संस्कृत पाठ
कालेन ब्राह्मणः क्षुधया पीडितः सन् मूर्च्छितः भूमौ पतितः। ततः भार्या तं कथयति— भो स्वामिन्! आलस्यं परित्यज्य परिश्रमं कुरु। परिश्रमेण विना किमपि न प्राप्यते। यः परिश्रमं करोति सः एव सुखं प्राप्नोति।
सरल हिंदी अर्थ
समय बीतने पर ब्राह्मण भूख से पीड़ित होकर मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। तब पत्नी उससे कहती है— हे स्वामी! आलस्य छोड़कर परिश्रम करो। परिश्रम के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता। जो परिश्रम करता है वही सुख प्राप्त करता है।
भावार्थ
आलस्य का परिणाम सदा दुःखदायी होता है। परिश्रम ही सुख का मूल है।
७
आलसी का चेतना
संस्कृत पाठ
ततः ब्राह्मणः स्वभार्यायाः वचनं श्रुत्वा विचारयति— अहो! अहं तावत् आलस्येन महान् दुःखं प्राप्तवान्। इदानीं परिश्रमं करिष्यामि। यथा परिश्रमः तथा फलम् इति ज्ञात्वा सः परिश्रमं कर्तुं आरभत।
सरल हिंदी अर्थ
तब ब्राह्मण अपनी पत्नी का वचन सुनकर विचार करता है— अहो! मैं तो आलस्य के कारण बहुत बड़ा दुःख पा चुका हूँ। अब मैं परिश्रम करूँगा। जैसा परिश्रम वैसा फल है, यह जानकर वह परिश्रम करने लगा।
८
परिश्रम का फल
संस्कृत पाठ
परिश्रमेण सः ब्राह्मणः यशः धनं च प्राप्नोत्। ग्रामजनाः तं सम्मानयन्ति स्म। गृहे सुखं समृद्धिश्च आगता। ततः सः ब्राह्मणः स्वभार्यां कथयति— भद्रे! परिश्रमेण एव सुखं प्राप्यते। आलस्यं मनुष्यस्य महाशत्रुः अस्ति।
सरल हिंदी अर्थ
परिश्रम से वह ब्राह्मण यश और धन प्राप्त करने लगा। गाँव के लोग उसका सम्मान करने लगे। घर में सुख और समृद्धि आ गई। तब वह ब्राह्मण अपनी पत्नी से कहता है— हे भद्रे! परिश्रम से ही सुख प्राप्त होता है। आलस्य मनुष्य का महाशत्रु है।
भावार्थ
परिश्रम का फल सदा मीठा होता है। परिश्रम से ही मनुष्य यश, धन और सुख प्राप्त करता है।
९
कथा का उपदेश
संस्कृत श्लोक
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
सरल हिंदी अर्थ
आलस्य मनुष्यों के शरीर में स्थित महान् शत्रु है। उद्यम (परिश्रम) के समान कोई बंधु नहीं है, क्योंकि परिश्रम करने वाला मनुष्य कभी दुःख नहीं पाता।
भावार्थ
यह श्लोक कथा का सार है। आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और परिश्रम उसका सच्चा मित्र। जो परिश्रम करता है, वह कभी असफल नहीं होता।
१०
कथा का सार
संस्कृत पाठ
एवं आलसकथा मनुष्यं परिश्रमस्य महत्वं बोधयति। आलस्यं परित्यज्य परिश्रमं कुर्वन्तु इति एषा कथा सन्देशं ददाति। यः परिश्रमं करोति सः एव जीवने सफलतां प्राप्नोति।
सरल हिंदी अर्थ
इस प्रकार आलसकथा मनुष्य को परिश्रम के महत्व का बोध कराती है। आलस्य छोड़कर परिश्रम करें, यही इस कथा का संदेश है। जो परिश्रम करता है वही जीवन में सफलता प्राप्त करता है।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ (Difficult Words)
| संस्कृत शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| आलसी | आलस करने वाला, आलसी |
| परिश्रमम् | मेहनत, श्रम |
| गृहस्थाश्रमः | गृहस्थ जीवन |
| निर्वाह्यते | निर्वाह होता है |
| भद्रे | हे भद्रे (स्त्री को संबोधन) |
| प्रयोजनम् | प्रयोजन, आवश्यकता |
| साहाय्यम् | सहायता |
| प्राप्स्यते | प्राप्त होगा |
| व्यर्थः | व्यर्थ, बेकार |
| भोजनसमये | भोजन के समय |
| क्षिप्यते | डाला जाता है |
| भोक्ष्ये | मैं खाऊँगा |
| पीडितः | पीड़ित, दुःखी |
| उत्थितौ | उठे हुए |
| भिक्षाम् | भिक्षा |
| दातुम् | देने के लिए |
| क्रियते | किया जाता है |
| कालेन | समय बीतने पर |
| क्षुधया | भूख से |
| मूर्च्छितः | मूर्छित, बेहोश |
| भूमौ | भूमि पर |
| पतितः | गिरा हुआ |
| परित्यज्य | त्यागकर |
| प्राप्यते | प्राप्त होता है |
| प्राप्नोति | प्राप्त करता है |
| विचारयति | विचार करता है |
| अहो | हाय! (आश्चर्य/खेदसूचक) |
| ज्ञात्वा | जानकर |
| आरभत | आरंभ किया |
| यशः | यश, कीर्ति |
| धनम् | धन, पैसा |
| सम्मानयन्ति | सम्मान करते हैं |
| समृद्धिः | समृद्धि, वैभव |
| महाशत्रुः | महान् शत्रु |
| रिपुः | शत्रु |
| उद्यमः | उद्यम, परिश्रम |
| बन्धुः | बंधु, भाई, मित्र |
| नावसीदति | दुःख नहीं पाता |
| बोधयति | बोध कराती है |
| सन्देशम् | संदेश |
पाठ का मुख्य भाव
- १आलस्य महाशत्रु: आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जो उसे कुछ भी करने नहीं देता।
- २परिश्रम का महत्व: परिश्रम के बिना जीवन में कुछ भी प्राप्त नहीं होता; परिश्रम ही सुख और समृद्धि का मूल है।
- ३भाग्य और कर्म: केवल भाग्य के भरोसे बैठे रहना मूर्खता है; कर्म (परिश्रम) ही सफलता दिलाता है।
- ४आलसी का परिणाम: आलसी व्यक्ति को अंततः दुःख, भूख और अपमान का सामना करना पड़ता है।
- ५परिवर्तन की शक्ति: यदि मनुष्य अपनी गलती समझकर आलस्य छोड़ दे, तो वह यश, धन और सुख प्राप्त कर सकता है।
महत्वपूर्ण तथ्य (Exam Facts)
- १“आलसकथा” पाठ का मुख्य विषय आलस्य के दुष्परिणाम हैं।
- २कथा के मुख्य पात्र आलसी ब्राह्मण और उसकी धैर्यवान पत्नी हैं।
- ३आलसी ब्राह्मण भोजन करने में भी आलस्य करता था।
- ४भूख के कारण वह मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा।
- ५पत्नी के उपदेश से वह परिश्रम करने लगा।
- ६परिश्रम से उसे यश और धन दोनों प्राप्त हुए।
- ७“आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः” — यह प्रसिद्ध श्लोक इसी पाठ में है।
- ८कथा का संदेश — आलस्य छोड़ो, परिश्रम करो।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण पंक्तियाँ
- ✦“आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।” — आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित महान् शत्रु है।
- ✦“नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।” — उद्यम (परिश्रम) के समान कोई बंधु नहीं, जो करने वाले को दुःख नहीं पहुँचाता।
- ✦“परिश्रमेण विना किमपि न प्राप्यते।” — परिश्रम के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता।
- ✦“यथा परिश्रमः तथा फलम्।” — जैसा परिश्रम, वैसा फल।
- ✦“यः परिश्रमं करोति सः एव सुखं प्राप्नोति।” — जो परिश्रम करता है वही सुख पाता है।
Quick Revision
- १आलसकथा = आलस्य के दुष्परिणाम की कथा
- २मुख्य पात्र = आलसी ब्राह्मण और उसकी पत्नी
- ३ब्राह्मण = अत्यंत आलसी, भोजन करने में भी आलसी
- ४पत्नी = चिंतित, धैर्यवान, उपदेशक
- ५आलस्य का परिणाम = भूख, मूर्छा, दुःख
- ६परिश्रम का परिणाम = यश, धन, समृद्धि, सुख
- ७मुख्य श्लोक = आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः
- ८संदेश = आलस्य छोड़ो, परिश्रम करो
- ९परिश्रम ही सच्चा मित्र है
- १०भाग्य के भरोसे बैठना मूर्खता है
✦ आलस्य महाशत्रुः, परिश्रमः परमो मित्रम् ✦
(आलस्य महाशत्रु है, परिश्रम परम मित्र)
(आलस्य महाशत्रु है, परिश्रम परम मित्र)
