APNI KAKSHA • BSEB Class 10 Sanskrit

त्रयोदशः पाठः — विश्वशान्तिः

पीयूषम् (भाग-2) • विश्व की शांति

📖 पुस्तक: पीयूषम् भाग-2 ✍️ कक्षा: 10 | बोर्ड: BSEB 🔤 संस्कृत — हिंदी अर्थ
📜 पाठ का संक्षिप्त परिचय

“विश्वशान्तिः” पाठ में वर्तमान संसार में फैली अशांति का चित्रण और उसके समाधान का निरूपण किया गया है। आज विश्वभर में विभिन्न प्रकार के विवाद छिड़े हुए हैं, जिनसे देशों में आंतरिक और बाह्य अशांति फैली हुई है। सीमा, नदी-जल, धर्म, दल इत्यादि को लेकर लोग स्वार्थप्रेरित होकर असहिष्णु हो गए हैं। इस पाठ में पितामह और उनके पौत्र संतोष के संवाद के माध्यम से अशांति के कारणों और समाधान पर विचार किया गया है। पाठ में भारतीय संस्कृति के वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे आदर्शों पर बल दिया गया है।

१

विश्वशान्ति की आवश्यकता

संस्कृत पाठ
इदानीम् इदं विश्वं परितः अशान्तं वातावरणं प्रसृतं वर्तते। परमाण्वस्त्राणां रासायनिकास्त्राणां च आविष्कारेण जगदिदं भयाक्रान्तं प्रति भाति। क्वचिद् दुर्भिक्षतः कुत्रचिद् राजसत्ताकारणतः क्वचित् प्राकृतिकीभिः आपदिभिः च अशान्तिः सञ्जाता अस्ति।
सरल हिंदी अर्थ
आजकल यह संसार चारों ओर से अशांत वातावरण में डूबा हुआ है। परमाणु अस्त्रों और रासायनिक अस्त्रों के आविष्कार से यह संसार भयाक्रांत-सा प्रतीत होता है। कहीं अकाल से, कहीं राजसत्ता के कारण, कहीं प्राकृतिक आपदाओं से अशांति उत्पन्न हो गई है।
२

हृदयविदारक समाचार

संस्कृत पाठ
इति दुर्गासप्तशत्या: मन्त्रं पठतः पितामहस्य दृष्टिः तस्मिन् वार्तापत्रे आपतिता, यस्मिन् पाकिस्तान देशस्य क्षेत्रविशेषे तालिबानस्य दुष्प्रभावेन प्रवृत्तं हृदयविदारकम् अमानवीय व्यवहारजातं प्रकाशितम् आसीत्। तत् पठित्वा शतवर्षीयः पितामहः मनसा व्यथितः सन् मम युवानं पुत्रं सन्तोषनामधेयं पृच्छति।
सरल हिंदी अर्थ
इस प्रकार दुर्गासप्तशती का मंत्र पढ़ते हुए पितामह की दृष्टि उस समाचार-पत्र पर पड़ी, जिसमें पाकिस्तान देश के एक विशेष क्षेत्र में तालिबान के दुष्प्रभाव से हुए हृदयविदारक और अमानवीय व्यवहार का प्रकाशन हुआ था। उसे पढ़कर सौ वर्षीय पितामह मन से व्यथित होकर अपने युवा पुत्र — जिसका नाम संतोष था — से पूछते हैं।
३

अशान्ति के मुख्य कारण

संस्कृत श्लोक
स्नेहाभावे बुभुक्षा च, नकारात्मकचिन्तनम्। निरक्षरता स्वार्थवृद्धिश्च, अत्याधुनिकतायुक्तता।। दृष्टप्रसारनीतिश्च, बलिराष्ट्रस्य सर्वदा। सत्तालिप्सा च दस्यूनां कारणानि हि मुख्यतः।।
सरल हिंदी अर्थ
स्नेह का अभाव, भूख, नकारात्मक सोच, अशिक्षा, स्वार्थ की वृद्धि और अत्यधिक आधुनिकता — ये मुख्य कारण हैं। शक्तिशाली देशों की विस्तारवादी नीति और दस्युओं (आतंकवादियों) की सत्ता पाने की इच्छा विश्व की अशांति के प्रमुख कारण हैं।
भावार्थ
विश्व की अशांति के अनेक कारण हैं — प्रेम का अभाव, भूख, नकारात्मक चिंतन, अशिक्षा, स्वार्थ की वृद्धि, अत्यधिक आधुनिकता, बलवान देशों की विस्तारवादी नीति और आतंकवादियों की सत्ता-लिप्सा। इनमें से प्रत्येक कारण विश्व शांति को नष्ट करने में सहायक है।
४

आध्यात्मिक समाधान एवं सुभाषितानि

संस्कृत श्लोक
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।। सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।। अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
सरल हिंदी अर्थ
इस संसार में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से आच्छादित है। त्यागभाव से भोग करो, किसी के धन के प्रति लोभ मत करो। सभी लोग सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी शुभ देखें, कोई भी दुःखी न हो। यह मेरा है, वह पराया है — ऐसा सोचना छोटे मन वालों का काम है; उदार हृदय वालों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
भावार्थ
विश्व शांति का आध्यात्मिक समाधान यह है कि हम सब में ईश्वर को देखें, त्यागभाव से जीवन बिताएँ, सभी के सुख की कामना करें और ‘अपना-पराया’ के भेद को मिटाकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना अपनाएँ।
५

अशान्ति के दो कारण — द्वेष और असहिष्णुता

संस्कृत पाठ
वस्तुतः द्वेषः असहिष्णुता च अशान्तेः कारणद्वयम्। एको देशः अपरस्य उत्कर्षं दृष्ट्वा द्वेष्टि, तस्य देशस्य उत्कर्षनाशाय निरन्तरं प्रयतते। द्वेषः एवं असहिष्णुतां जनयति। इमौ दोषौ परस्परं वैरमुत्पादयतः। स्वार्थश्च वैरं प्रवर्धयति। स्वार्थप्रेरितो जनः अहंभावेन परस्य धर्मं जाति सम्पत्तिं क्षेत्रं भाषां वा न सहते।
सरल हिंदी अर्थ
वास्तव में, ईर्ष्या और असहनशीलता अशांति के मुख्य दो कारण हैं। एक देश दूसरे देश की उन्नति देखकर जलभुन जाता है और उस देश को हानि पहुँचाने का प्रयास करने लगता है। द्वेष ही असहनशीलता पैदा करता है। इन दोनों दोषों के कारण शत्रुता जन्म लेती है। स्वार्थ दुश्मनी बढ़ाती है। स्वार्थ से अंधा व्यक्ति अहंकारवश दूसरों के धार्मिक, सामाजिक और भाषाई एकता सहन नहीं कर पाता।
६

स्वार्थ का निवारण और परोपकार

संस्कृत पाठ
आत्मन एव सर्वमुत्कृष्टमिति मन्यते। राजनीतिज्ञाश्च अत्र विशेषेण प्रेरकाः। सामान्यो जनः न तथा विश्वसन्नपि बलेन प्रेरितो जायते। स्वार्थोपदेशः बलपूर्वकं निवारणीयः। परोपकारं प्रति यदि प्रवृत्तिः उत्पाद्यते तदा सर्वे स्वार्थं त्यजेयुः। अत्र महापुरुषाः विद्वांसः चिन्तकाश्च न विरलाः सन्ति। तेषां कर्तव्यमिदं यत् जने-जने, समाजे-समाजे, राज्ये-राज्ये च परमार्थ वृत्तिं जनयेयुः।
सरल हिंदी अर्थ
वे निजी विकास को ही सर्वोत्तम मानते हैं। इस निकृष्ट विचार के मुख्य प्रेरक राजनेता हैं। सामान्य लोग ही नहीं, विशिष्ट जन भी बलपूर्वक प्रेरित किए जाते हैं। इसलिए स्वार्थी भावना को बलपूर्वक दूर करना चाहिए। यदि परोपकार के प्रति रुचि जग जाती है तब स्वतः सारे स्वार्थ मिट जाते हैं। यहाँ महापुरुष, विद्वान तथा चिन्तकों का अभाव नहीं है। उनका कर्तव्य है कि वे हर व्यक्ति, हर समाज तथा हर देश में परोपकार की भावना का प्रचार करें।
७

ज्ञान और क्रिया

संस्कृत पाठ
शुष्कः उपदेशश्च न पर्याप्तः, प्रत्युत तस्य कार्यान्वयनञ्च जीवनेऽनिवार्यम्। उक्तञ्च – ज्ञानं भारः क्रियां विना। देशानां मध्ये च विवादान् शमयितुमेव संयुक्तराष्ट्रसंघप्रभृतयः संस्थाः सन्ति। ताश्च काले-काले आशङ्कितमपि विश्वयुद्धं निवारयन्ति।
सरल हिंदी अर्थ
थोथा उपदेश काफी नहीं है, बल्कि वैसा आचरण भी अपनाना जरूरी है। क्योंकि कहा गया है कि क्रिया के बिना ज्ञान बोझ स्वरूप होता है। दो देशों के आपसी विवाद को खत्म करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ आदि संस्थाएँ हैं। यही समय-समय पर संभावित विश्व युद्ध को दूर करती हैं।
८

बुद्ध का उपदेश और वसुधैव कुटुम्बकम्

संस्कृत पाठ
भगवान बुद्धः पुराकाले एव वैरेण वैरस्य शमनम् असम्भवं प्रोक्तवान्। अवैरेण करुणया मैत्रीभावेन च वैरस्य शान्तिः भवतीति सर्वे मन्यन्ते। भारतीयाः नीतिकाराः सत्यमेव उद्घोषयन्ति – अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।
सरल हिंदी अर्थ
प्राचीन काल में भगवान बुद्ध ने कहा था, दुश्मनी से दुश्मनी को खत्म करना संभव नहीं है। मित्रता एवं दया से शत्रुता भाव को शांत करना संभव है। ऐसा सबका मानना है। भारतीय नीतिज्ञों ने सच ही कहा है — यह मेरा है, वह दूसरों का है — ऐसा नीच विचारवाले मानते हैं। उदारचित वाले अर्थात् महापुरुषों के लिए सारा संसार ही अपने परिवार जैसा है।
९

परोपकार और विश्वशान्ति की आशा

संस्कृत पाठ
परपीडनम् आत्मनाशाय जायते, परोपकारश्च शान्तिकारणं भवति। अद्यापि परस्य देशस्य संकटकाले अन्ये देशाः सहायताराशि सामग्री च प्रेषयन्ति इति विश्वशान्तेः सूर्योदयो दृश्यते।
सरल हिंदी अर्थ
दूसरों के कष्ट पहुँचाने से अपना ही नुकसान होता है और दूसरों के सहयोग से शांति मिलती है। आज भी किसी दूसरे देश के संकट में सहायता राशि भेजी जाती है। इससे विश्व शांति की आशा प्रकट होती है।
🔤 महत्वपूर्ण शब्दार्थ (Difficult Words)
संस्कृत शब्द हिंदी अर्थ
प्रसृतम्फैला हुआ
आविष्कारेणआविष्कार द्वारा
भयाक्रान्तम्भय से ग्रस्त
दुर्भिक्षतःअकाल से
राजसत्ताकारणतःराजसत्ता के कारण से
सञ्जाताउत्पन्न हुई
वार्तापत्रेसमाचार-पत्र में
हृदयविदारकम्हृदय विदीर्ण करने वाला
अमानवीयम्अमानवीय
व्यथितःदुखी हुआ
बुभुक्षाभूख
नकारात्मकचिन्तनम्नकारात्मक सोच
निरक्षरताअशिक्षा
स्वार्थवृद्धिःस्वार्थ की वृद्धि
अत्याधुनिकतायुक्तताअत्यधिक आधुनिकता
दृष्टप्रसारनीतिःविस्तारवादी नीति
बलिराष्ट्रस्यशक्तिशाली राष्ट्र का
सत्तालिप्सासत्ता पाने की इच्छा
दस्यूनाम्आतंकवादियों का
स्नेहाभावेस्नेह के अभाव में
ईशावास्यम्ईश्वर से आच्छादित
त्यक्तेनत्यागभाव से
गृधःलोभ करो
निरामयाःनिरोगी
लघुचेतसाम्छोटे मन वालों का
उदारचरितानाम्उदार हृदय वालों का
वसुधैव कुटुम्बकम्पूरी पृथ्वी ही परिवार है
द्वेषःईर्ष्या
असहिष्णुताअसहनशीलता
उत्कर्षम्उन्नति
वैरम्शत्रुता
परोपकारम्परोपकार
परमार्थवृत्तिम्परोपकार की भावना
संयुक्तराष्ट्रसंघःसंयुक्त राष्ट्र संघ
शुष्कः उपदेशःथोथा उपदेश
कार्यान्वयनम्कार्यान्वयन
मैत्रीभावेनमित्रता भाव से
परपीडनम्दूसरों को कष्ट देना
आत्मनाशायअपने विनाश के लिए
सहायताराशिःसहायता राशि
सूर्योदयःसूर्योदय
⭐ पाठ का मुख्य भाव
  • १
    अशांति के कारण: स्नेहाभाव, भूख, नकारात्मक चिंतन, अशिक्षा, स्वार्थवृद्धि, अत्यधिक आधुनिकता, विस्तारवादी नीति और सत्तालिप्सा — ये विश्व अशांति के प्रमुख कारण हैं।
  • २
    द्वेष और असहिष्णुता: द्वेष और असहिष्णुता अशांति के दो मूल कारण हैं। स्वार्थ इन्हें और बढ़ाता है।
  • ३
    आध्यात्मिक समाधान: ईश्वर सर्वव्यापी है, त्यागभाव से जीवन बिताएँ, सभी के सुख की कामना करें और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना अपनाएँ।
  • ४
    परोपकार का महत्व: स्वार्थ का त्याग और परोपकार की भावना से ही विश्व शांति संभव है। ज्ञान का अर्थ क्रिया के साथ है, केवल उपदेश पर्याप्त नहीं।
  • ५
    बुद्ध का उपदेश: वैर से वैर का शमन संभव नहीं; अवैर, करुणा और मैत्री भाव से ही शत्रुता शांत होती है।
📌 महत्वपूर्ण तथ्य (Exam Facts)
  • १
    “विश्वशान्तिः” पाठ का मुख्य उद्देश्य विश्व शांति की आवश्यकता और उसके उपाय बताना है।
  • २
    पितामह की दृष्टि पाकिस्तान के तालिबान प्रभावित क्षेत्र की अमानवीय घटना पर पड़ी।
  • ३
    पितामह की आयु 100 वर्ष थी।
  • ४
    पितामह के पुत्र/पौत्र का नाम संतोष था।
  • ५
    अशांति के कारण — स्नेहाभाव, बुभुक्षा, नकारात्मक चिंतन, निरक्षरता, स्वार्थवृद्धि।
  • ६
    अशांति के दो मुख्य कारण — द्वेष और असहिष्णुता।
  • ७
    “ईशावास्यमिदं सर्वम्” — यह श्लोक ईशोपनिषद् से है।
  • ८
    “वसुधैव कुटुम्बकम्” — पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
  • ९
    संयुक्त राष्ट्र संघ देशों के विवादों को सुलझाने का प्रयास करता है।
  • १०
    पाठ का संदेश — वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ही विश्व शांति संभव है।
🎯 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण पंक्तियाँ
  • ✦
    “इदानीम् इदं विश्वं परितः अशान्तं वातावरणं प्रसृतं वर्तते।” — आजकल यह संसार चारों ओर से अशांत वातावरण में डूबा हुआ है।
  • ✦
    “स्नेहाभावे बुभुक्षा च, नकारात्मकचिन्तनम्।” — स्नेह का अभाव, भूख और नकारात्मक सोच।
  • ✦
    “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।” — सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों।
  • ✦
    “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।” — ‘अपना-पराया’ की गणना छोटे मन वाले करते हैं; उदार लोगों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
  • ✦
    “परपीडनम् आत्मनाशाय जायते, परोपकारश्च शान्तिकारणं भवति।” — दूसरों को कष्ट देना अपने नाश का कारण है और परोपकार शांति का कारण है।
⚡ Quick Revision
  • १
    विश्वशान्तिः = विश्व की शांति
  • २
    वर्तमान विश्व = अशांति से ग्रस्त
  • ३
    अशांति के कारण = स्नेहाभाव, बुभुक्षा, नकारात्मक चिंतन, निरक्षरता, स्वार्थवृद्धि
  • ४
    दो मुख्य कारण = द्वेष और असहिष्णुता
  • ५
    मुख्य श्लोक = ईशावास्यमिदं सर्वम् (ईशोपनिषद्)
  • ६
    प्रमुख सूक्ति = वसुधैव कुटुम्बकम्
  • ७
    बुद्ध का उपदेश = वैर से वैर नहीं मिटता, अवैर से मिटता है
  • ८
    समाधान = परोपकार, त्यागभाव, सर्वप्रेम
  • ९
    संयुक्त राष्ट्र संघ = विवादों का शमन
  • १०
    संदेश = वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से विश्व शांति संभव
✦ अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। ✦
(अपना-पराया सोचना छोटे मन का काम है; उदार लोगों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है)
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