कक्षा 12 राजनीति विज्ञान – अध्याय 2: दो ध्रुवीयता का अंत

1991 में सोवियत संघ का विघटन विश्व इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक था। इस घटना ने शीत युद्ध के युग का अंत कर दिया और दो ध्रुवीयता (Bipolarity) की व्यवस्था समाप्त हो गई। सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व एकध्रुवीय (Unipolar) हो गया, जिसमें अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। इस अध्याय में हम सोवियत संघ के विघटन के कारणों, परिणामों तथा उसके बाद की विश्व व्यवस्था का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

सोवियत संघ का विघटन केवल एक देश का विघटन नहीं था, बल्कि यह पूरी विश्व व्यवस्था का पुनर्गठन था। इसने समाजवादी व्यवस्था की विफलता, पूँजीवाद की विजय तथा नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत को चिह्नित किया। इस अध्याय में हम इन सभी पहलुओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे।

इस अध्याय का शीर्षक “दो ध्रुवीयता का अंत” इसलिए रखा गया है क्योंकि यह अध्याय शीत युद्ध की समाप्ति तथा सोवियत संघ के विघटन के बाद की विश्व व्यवस्था का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है।

1. सोवियत संघ का परिचय

1.1 सोवियत संघ की स्थापना

  • सोवियत संघ की स्थापना 1917 की रूसी क्रांति के बाद हुई।
  • 1917 में व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक क्रांति हुई।
  • 1922 में सोवियत समाजवादी गणराज्यों का संघ (USSR) बना।
  • इसमें 15 गणराज्य शामिल थे।
  • राजधानी – मास्को।

1.2 सोवियत संघ की विशेषताएँ

  • यह समाजवादी व्यवस्था पर आधारित था।
  • उत्पादन के साधनों पर राज्य का नियंत्रण था।
  • यह एक दल (कम्युनिस्ट पार्टी) की व्यवस्था थी।
  • यह विश्व की दूसरी महाशक्ति थी।
  • इसका विस्तार पूर्वी यूरोप, मध्य एशिया तक था।
  • यह नाटो के विरुद्ध वारसा संधि का नेतृत्व करता था।

1.3 सोवियत संघ की उपलब्धियाँ

  • 1957 में पहला कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक प्रक्षेपित किया।
  • 1961 में यूरी गागरिन अंतरिक्ष में जाने वाला पहला मानव बना।
  • औद्योगिक विकास में अग्रणी रहा।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य में प्रगति की।
  • परमाणु हथियारों में अमेरिका को टक्कर दी।
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2. सोवियत संघ के विघटन के कारण

2.1 आर्थिक कारण

  • केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था – सोवियत अर्थव्यवस्था पूर्णतः केंद्रीकृत थी।
  • बाजार की माँग के अनुसार उत्पादन नहीं होता था।
  • उपभोक्ता वस्तुओं की कमी थी।
  • जीवन स्तर गिरता जा रहा था।
  • सैन्य खर्च बहुत अधिक था।
  • कृषि उत्पादन में गिरावट आई।
  • भ्रष्टाचार बढ़ा।
  • तकनीकी पिछड़ापन।

2.2 राजनीतिक कारण

  • एक दलीय व्यवस्था में लोकतंत्र का अभाव।
  • कम्युनिस्ट पार्टी का निरंकुश शासन।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध।
  • गोर्बाचेव के सुधारों से अपेक्षाएँ बढ़ीं।
  • राष्ट्रवादी भावनाओं का उभार।

2.3 राष्ट्रीयता की समस्या

  • सोवियत संघ में 15 गणराज्य थे।
  • प्रत्येक गणराज्य की अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान थी।
  • केंद्र का नियंत्रण बढ़ने से असंतोष बढ़ा।
  • बाल्टिक गणराज्य (एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया) स्वतंत्रता चाहते थे।
  • यूक्रेन, जॉर्जिया, आर्मेनिया आदि में राष्ट्रवादी आंदोलन हुए।

2.4 गोर्बाचेव के सुधार

  • मिखाइल गोर्बाचेव 1985 में सोवियत संघ के नेता बने।
  • ग्लासनोस्त (खुलापन) – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई।
  • पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) – आर्थिक सुधार किए गए।
  • इन सुधारों से अपेक्षाएँ बढ़ीं, लेकिन परिणाम नहीं मिले।
  • सुधारों ने विघटन की प्रक्रिया को तेज कर दिया।
  • गोर्बाचेव को 1990 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला।

2.5 बाहरी कारण

  • अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप (1979-89) विफल रहा।
  • अमेरिका के साथ हथियारों की दौड़ ने अर्थव्यवस्था को कमजोर किया।
  • पूर्वी यूरोप के देशों में लोकतांत्रिक आंदोलन हुए।
  • चीन के साथ संबंधों में तनाव।
  • पश्चिमी देशों का आर्थिक दबाव।
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3. सोवियत संघ का विघटन

3.1 विघटन की प्रक्रिया

  • 1989 में बर्लिन की दीवार गिरी।
  • 1990 में जर्मनी का एकीकरण हुआ।
  • 1991 में वारसा संधि का विघटन हुआ।
  • अगस्त 1991 में तख्तापलट का प्रयास हुआ, जो विफल रहा।
  • दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का औपचारिक विघटन हुआ।
  • 15 गणराज्य स्वतंत्र हो गए।
  • रूस सोवियत संघ का उत्तराधिकारी बना।

3.2 स्वतंत्र हुए गणराज्य

  • रूस, यूक्रेन, बेलारूस।
  • एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया।
  • जॉर्जिया, आर्मेनिया, अजरबैजान।
  • कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान।
  • मोल्दोवा।

3.3 विघटन के परिणाम

  • शीत युद्ध का अंत हुआ।
  • दो ध्रुवीयता समाप्त हो गई।
  • अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बन गया।
  • समाजवादी व्यवस्था की विफलता सिद्ध हुई।
  • नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत हुई।
  • पूँजीवाद का प्रसार हुआ।
  • वैश्वीकरण को बल मिला।
◆ ◆ ◆

4. सोवियत संघ के विघटन के परिणाम

4.1 विश्व राजनीति पर प्रभाव

  • शीत युद्ध का अंत हुआ।
  • दो ध्रुवीयता समाप्त हो गई।
  • अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बन गया।
  • नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत हुई।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका बढ़ी।
  • क्षेत्रीय संगठनों का महत्व बढ़ा।

4.2 आर्थिक परिणाम

  • समाजवादी अर्थव्यवस्था की विफलता।
  • पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का प्रसार।
  • वैश्वीकरण को बल मिला।
  • बाजार अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला।
  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विस्तार हुआ।

4.3 सैन्य परिणाम

  • हथियारों की दौड़ कम हुई।
  • निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई।
  • NATO का विस्तार हुआ।
  • क्षेत्रीय संघर्ष बढ़े।
  • आतंकवाद का उदय हुआ।

4.4 भारत पर प्रभाव

  • भारत ने रूस के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे।
  • भारत ने नई आर्थिक नीति अपनाई।
  • भारत ने अमेरिका के साथ संबंध सुधारे।
  • भारत ने वैश्वीकरण को अपनाया।
  • भारत की विदेश नीति में बदलाव आया।
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5. नई विश्व व्यवस्था

5.1 एकध्रुवीयता (Unipolarity)

  • सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बन गया।
  • अमेरिका ने विश्व राजनीति में अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
  • अमेरिका ने आर्थिक, सैन्य और सांस्कृतिक प्रभुत्व बढ़ाया।
  • इस व्यवस्था को ‘एकध्रुवीय’ कहा जाता है।

5.2 अमेरिकी प्रभुत्व

  • सैन्य प्रभुत्व – अमेरिका की सैन्य शक्ति विश्व में सबसे बड़ी है।
  • आर्थिक प्रभुत्व – अमेरिकी अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी है।
  • सांस्कृतिक प्रभुत्व – अमेरिकी संस्कृति का विश्व में प्रसार हुआ।
  • तकनीकी प्रभुत्व – अमेरिका तकनीकी क्षेत्र में अग्रणी है।
  • राजनीतिक प्रभुत्व – अमेरिका का प्रभाव संयुक्त राष्ट्र संघ में भी है।

5.3 बहुध्रुवीयता की ओर

  • चीन, रूस, यूरोपीय संघ, जापान जैसी शक्तियों का उदय हुआ।
  • भारत भी उभरती हुई शक्ति बना।
  • ब्रिक्स (BRICS) जैसे संगठन बने।
  • विश्व बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है।
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6. सोवियत संघ के विघटन से सीख

6.1 समाजवाद की विफलता

  • केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था की विफलता।
  • लोकतंत्र का अभाव।
  • मानवाधिकारों का हनन।
  • नवाचार का अभाव।

6.2 लोकतंत्र का महत्व

  • लोकतंत्र में जनता की भागीदारी आवश्यक है।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जरूरी है।
  • बहुलवाद को बढ़ावा देना चाहिए।
  • राष्ट्रीयताओं का सम्मान करना चाहिए।

6.3 आर्थिक सुधार

  • बाजार अर्थव्यवस्था की भूमिका महत्वपूर्ण है।
  • निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहिए।
  • तकनीकी विकास पर ध्यान देना चाहिए।
  • जीवन स्तर में सुधार करना चाहिए।
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7. महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

  • दो ध्रुवीयता – विश्व का दो महाशक्तियों के नेतृत्व में विभाजन।
  • एकध्रुवीयता – विश्व में एक ही महाशक्ति का प्रभुत्व।
  • बहुध्रुवीयता – विश्व में अनेक शक्ति केंद्रों का उदय।
  • ग्लासनोस्त – खुलापन, गोर्बाचेव का सुधार।
  • पेरेस्त्रोइका – पुनर्गठन, गोर्बाचेव का आर्थिक सुधार।
  • वारसा संधि – सोवियत नेतृत्व वाला पूर्वी सैन्य गठबंधन।
  • CIS – स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रमंडल।
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8. महत्वपूर्ण तथ्य

  • सोवियत संघ की स्थापना 1922 में हुई।
  • सोवियत संघ में 15 गणराज्य थे।
  • 1917 में बोल्शेविक क्रांति हुई।
  • मिखाइल गोर्बाचेव 1985 में नेता बने।
  • गोर्बाचेव को 1990 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
  • बर्लिन की दीवार 1989 में गिरी।
  • जर्मनी का एकीकरण 1990 में हुआ।
  • वारसा संधि का विघटन 1991 में हुआ।
  • सोवियत संघ का विघटन दिसंबर 1991 में हुआ।
  • रूस सोवियत संघ का उत्तराधिकारी बना।
  • सोवियत संघ ने 1957 में स्पुतनिक प्रक्षेपित किया।
  • यूरी गागरिन 1961 में अंतरिक्ष में जाने वाला पहला मानव बना।
◆ ◆ ◆

9. निष्कर्ष

अध्याय 2 “दो ध्रुवीयता का अंत” सोवियत संघ के विघटन तथा उसके बाद की विश्व व्यवस्था का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। यह अध्याय हमें सिखाता है:

  • सोवियत संघ का परिचय – यह विश्व की दूसरी महाशक्ति थी।
  • विघटन के कारण – आर्थिक, राजनीतिक, राष्ट्रीयता, गोर्बाचेव के सुधार।
  • विघटन की प्रक्रिया – 1989 से 1991 तक।
  • विघटन के परिणाम – शीत युद्ध का अंत, एकध्रुवीयता, वैश्वीकरण।
  • नई विश्व व्यवस्था – अमेरिकी प्रभुत्व, बहुध्रुवीयता की ओर।
  • सीख – लोकतंत्र, बाजार अर्थव्यवस्था, मानवाधिकारों का महत्व।

इस अध्याय का महत्व:

  • यह शीत युद्ध के अंत को समझाता है।
  • यह नई विश्व व्यवस्था को स्पष्ट करता है।
  • यह बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • यह समाजवाद और पूँजीवाद की तुलना में सहायक है।
  • यह आगे के अध्यायों को समझने की नींव प्रदान करता है।

इन नोट्स को अपनी परीक्षा की तैयारी के लिए उपयोग करें। सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को अच्छी तरह याद रखें और संभावित प्रश्नों का अभ्यास करें।

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